क्या पता कल रहें या न रहे

हमें हर रिश्ते संजोकर रखना चाहिए

क्या पता कल रहें या न रहें ।

क्यों बना रखे हो मन में दूरियाँ

आओ बैठो कुछ बात करें

कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

क्या पता कल रहें या न रहे

याद करें वो बचपन के दिन

कैसे साथ हम रहते थे

एक दूजे की पकड़ कर

उँगली साथ साथ हम चलते थे

कोई शिकायत होती थी

तो एक दूजे पर मढ़ते थे

पर कुछ ही क्षण में हम

सब साथ साथ खेलते थे ।

मन में न थी कोई कलुषता

प्रेम का सागर बहता था

कहाँ गया वो प्रेम आज

स्वार्थ की धारा में बह गये

मन नहीं मानता

बचपन की यादें याद आती हैं

वो साथ साथ खेलना

लड़ना झगड़ना यादें खूब सताती हैं

बँध गयी मन में गाँठ ऐसी

खुले तो ये कैसे खुले

बंद हो गये दिल के दरवाजे

गले मिले तो कैसे मिले

आओ बैठो बैठ कर कुछ बात करें

कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

क्या पता कल रहें या न रहे

कुछ दशक की जिन्दगी में

असंख्य मोड़ असंख्य खाइयाँ हैं

हर मोड़ पर हम मुड़ते गये

खाइयों में गिरते गये

कोई तो संबल चाहिए

खींच ले हमें बाहर

पर हम हैं कि गिरते गये

अपने ही ढकेलते गये ।

हमें हर रिश्ते संजोकर रखना चाहिए

क्या पता कल रहें या न रहें !

Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.