कान्हा मुक्तक

कान्हा कान्हा मन पुकारे, कान्हा में मन रमता है

कान्हा की मोहिनी सूरत पर, दिल मेरा जा टिकता है

ठुमक ठुमक कर कान्हा भागे, माँ यशोदा पीछे धाये

नंदबाबा टुकुर-टुकुर निहारे, ठुमकना अच्छा लगता है ।

कान्हा की लीला है न्यारी, व्याकुल दौड़ती गोपियाँ सारी

कान्हा मुरली की तान सुनावें,मंत्रमुग्ध हुई है प्रकृति सारी

कान्हा वन में गाय चराते, ग्वाल बाल सब उन्हें चिढ़ाते

कान्हा साँझ में घर जब आये, यशोदा से बताई बातें सारी

कालिया नाग यमुना में डरावे, भय से कोई पास न जावे

नाग के फन पर कान्हा नाचे, अद्भुत दिव्य रूप दिखावे

कान्हा का रूप वही मुझे भाये, नयन मेरे तृप्त हो जाये

नेत्र वही झलक को पावे, मानव जीवन धन्य हो जावे।

बचपन में कान्हा कहलाये, युवा हुये श्रीकृष्ण बन गये

कहीं कहलाते गोविन्दा हैं, कहीं भगवान जगन्नाथ हो गये

कुरुक्षेत्र मे बने सखा अर्जुन के, गीता ज्ञान सुनाते हैं

अनन्त नाम अनन्त प्रभाव, कान्हा जन मन में रच बस गये ।

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