जय हो हिंदुस्तान की व्यंग्य

महाराष्ट्र में रहना हो तो मराठी बोलो,

बंगाल में रहना हो तो बंगाली बोलो,

गुजरात में रहना हो तो गुजराती बोलो,

कर्नाटक में रहना हो तो कन्नड़ बोलो।

हर राज्य अपनी भाषा बोले,

पर जाति–धर्म–भाषा के नाम पर

क्यों देश को तोड़े?

जय हो हिंदुस्तान की।

कितनी भाषा, कितनी बोली,

न सीखो तो मिलती गोली।

मन में संकुचित सोच पाले,

नेताओं की जिह्वा पर न पड़ें छाले।

कहाँ जा रहा है देश हमारा?

कैसे कहें अब ये प्यारा?

नौजवान छोड़ रहे मातृभूमि को,

आरक्षण खा रहा प्रतिभा को।

धर्म–जाति में बँट गए हम,

खून के प्यासे हो गए हम।

जय हो हिंदुस्तान की।

कौन आया है जन्म से बँटकर?

यहाँ ही तो हम विभाजित हुए।

यहीं हमारा नामकरण हुआ,

यहीं हिन्दू बने, यहीं मुस्लिम बने,

यहीं सिख, यहीं ईसाई बने।

बँट गए हैं टुकड़ों–टुकड़ों में,

लड़ने और मरने के लिए।

जय हो हिंदुस्तान की।

जब तक नेता हैं इस धरती पर,

यह कलह नहीं जाएगी।

ये ही मूल षड्यंत्रकारी,

विनाशकारी और विध्वंसकारी।

वोट बैंक के लिए सब कुछ कर सकते हैं,

मौक़ा मिले तो देश भी बेच सकते हैं।

खुली सड़क पर अबला की इज़्ज़त लुटती है,

भीड़ मूक दर्शक बनी रह जाती है।

जय हो हिंदुस्तान की।

भारत यूँ ही ग़ुलाम नहीं हुआ,

हमारे खून में ही ग़द्दारी है।

हमारे खून में भ्रष्टाचार है,

हमारे खून में अत्याचार है,

हमारे खून में हलाहल भरा है।

हम न सुधरे हैं, न सुधरेंगे।

छोड़ो इक्कीसवीं सदी के विकास की बातें,

आ लौट चलें उसी लालटेन युग में।

जय हो हिंदुस्तान की।


Leave a Comment

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.