जब सन्नाटा बोल उठा गीत

गीत : जब सन्नाटा बोल उठा

कहाँ गए वे मिलने वाले डोरबेल अब नहीं बजती,

घर में कोई न आता, न पुरानी महफ़िल सजती॥

. सन्नाटा बोल उठा

दिखते घर में एक-दो जन हैं,

उनमें भी अब सन्नाटा।

सुबह ढले, फिर शाम उतरे,

पर मौन नहीं है घटता।

जीवन बन गया बोझिल-सा,

नीरस पथ यूँ ही कटता।

दीवारें भी मौन खड़ी हैं,

कोई बात नहीं करता।

बीते पलों की धूप तले अब,

यादों के साए दिखते हैं

मानो कहती हों बच्चों से,

“कैसा लग रहा ये सन्नाटा?”

.. . घर में कोई न आता ॥॥

पर अब इस मौन के भीतर भी,

कुछ मधुर स्वर सुनाई देते,

स्मृतियों के पंख लगाकर,

प्रियजन मन में आ बसते।

मन कहता “सब साथ हैं,

बस रूप नहीं अब दिखता।”

शांत हृदय में दीप जले तो,

हर अंधियारा छँटता॥

अब समझा जीवन का सार

हर पल है ईश्वर दान।

मिलन-विरह सब माया के खेल,

बस चलता उसका विधान।

जो चला गया, वह भी यहीं है,

बस रूप बदलकर हँसता।

मन-मंदिर में जब झाँकूँ मैं,

हर चेहरा ईश्वर बसता॥

सन्नाटे में भी संगीत है,

ये मन अब जान गया।

एकांत नहीं रहा शत्रु मेरा,

मन ही अब पहचान गया॥

सन्नाटा बोल उठा

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