दो वृद्ध दम्पत्ति (प्रियतमा की पीड़ा)


उठो प्रियतमे! देर हो गयी, मन मेरा अकुलाये,





कुछ तो कहो, मौन क्यों हो तुम, सूनापन न भाये।





सूर्य किरण फैल गयी नभ में, उजियारा घर आया,





परिन्दों ने छोड़ा अपना बसेरा, मधुर राग सुनाया।





ब्रह्म मुहूर्त में उठती थी, नित्य कर्म निभाती,





चाय बना कर स्नेह भरे हाथों से मुझे पिलाती।





आज न जाने कैसी निस्तब्धता घर में छायी,





कुछ तो बोलो प्राण प्रिये, क्यों चुपचाप समायी।





उठो प्रियतमे! देर हो गयी, मन मेरा अकुलाये…





प्रिय बोलो ना, मन घबराये, चिंता भीतर भारी,





निशब्द पड़ी चेतना-शून्य, कैसी दशा तुम्हारी।





तू ही तो जीवन की धारा, तू ही मेरी छाया,





तेरे बिन सूना यह जग सारा, सूनी हर माया।





कुछ अपनी कह, कुछ मेरी सुन, तू जीवन संगीत है,





तेरी धुन पर लहराती मन की हर एक प्रीत है।





उठो प्रियतमे! देर हो गयी, मन मेरा अकुलाये…





मैं तो ठहरा नेत्रहीन, कुछ देख नहीं पाता,





अनहोनी का आभास हृदय में, मन घबराता जाता।





घिसट-घिसट कर पास तुम्हारे अब मैं आने वाला,





जीवन साथी तुम बिन मेरा कौन बने रखवाला।





तन निस्पंद पड़ा है तेरा, अंतिम बेला आई,





क्रूर नियति ने कैसा यह जीवन खेल रचाई।





रुक जा प्रिये, जल्दी मत कर, मैं भी साथ चलूँगा,





तेरे बिन इस सूने जग में कैसे जीवित रहूँगा।





जीवन भर का साथ हमारा आज पूर्ण हो जाये,





तेरा हाथ थामे-थामे यह प्राण भी संग जाये।





साथ जिये थे, साथ मरेंगे, यही प्रण निभ जाये,





पति-पत्नी का पावन बंधन अमर कथा बन जाये।





उठो प्रियतमे! देर हो गयी, मन मेरा अकुलाये,





कुछ तो कहो, मौन क्यों हो तुम, सूनापन न भाये।


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