आशा का दीप दोहे आधारित

रही आस कह श्वांस से,धीरज धरना सीख |

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख ॥

टूटी नाव भरोस की, लहरों से क्या हार,

जो थामे प्रभु का चरण, पहुँचे भव से पार।

आँधी बोले दीप से, जलना मत तू दीख

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख ॥

सूखी धरती कह रही, बादल का विश्वास,

धीरज की हर बूँद में, छिपा हुआ है प्यास।

काल कहे बस समय से, रुकना मत तू सीख,

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख ॥

कर्म पुकारे भाव से, मैं ही तेरा लेख,

निज विवेक इतिहास को, रचता जो है देख।

मन बोले हर पीर से, आगे बढ़ता रेख।

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न देख ॥

नही पकड़ जो आप के, चुप हो देखें खेल,

कठपुतली हम आप हैं, उसकी चलती रेल।।

रही आस कह श्वांस से,धीरज धरना सीख |

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख ॥

छूटे जब सब साथ जो , तब तू भीतर देख,

भगवन -सुमिरन दीप है, काटे भव की रेख।

उमानाथ कह समझ ले , यह है जीवन सीख,

बिन माँगे मोती मिले, माँगे मिले न भीख ॥

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