अंक तेरह की पुकार

तेरह हूँ मैं, प्रश्न मेरा

क्यों मुझसे जग डरे भला?

गणना का मैं हिस्सा हूँ,

फिर मुझ पर ये रोष क्यों चला?

भारत ने भी मुझे बाँधा,

तेरहवीं के कर्मकांड में।

शुचिता पर प्रश्न उठाकर,

अशुद्ध कहा अनजान में।

पश्चिम ने और बदनाम किया,

यीशु के अंत से जोड़ा नाम।

अंधविश्वास की छाया तले,

किया मुझे अपमान तमाम।

क्या मैं मृत्यु का वाहक हूँ?

या कोई अमंगल दाता हूँ?

सिद्ध करो पहले मेरी गलती,

फिर क्यों मुझ पर घाव लगाऊँ?

सनातन संस्कृति ये न सिखाए,

किसी का अपमान करो।

शिव की त्रयोदशी पावन है,

तो मुझे अशुभ क्यों कहो?

विज्ञान ने डर को पहचाना,

“ट्रिस्काइडेकाफोबिया” नाम दिया।

ज्ञान कहेसंख्या सब सम हैं,

डर तो मन ने ही रच दिया।

ज्योतिष में मेरा महत्व है,

सटीक गणना करता हूँ।

तंत्र-मंत्र के गूढ़ रहस्यों में,

अद्भुत शक्ति भरता हूँ।

तेरह हूँ मैं, प्रश्न यही

क्यों मुझसे दुनिया घबराए?

संख्या मात्र निरपेक्ष है,

डर को ज्ञान मिटाए।

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