प्रियतम ! क्या क़ुसूर था मेरा
भोर में चुपके से छोड़ कर निकल चले ।
मैं आपकी यशोधरा हूँ
आपकी अर्द्धांगिनी हूँ, आपका संबल हूँ मैं,
आपके सत्य मार्ग में बाधक नहीं,
क्या दोष था आखिर मेरा
चुपके से मुझे छोड़ कर निकल चले ।
शपथ ली थी पवित्र अग्नि के समक्ष
सात जन्मों तक साथ निभाने की,
क्या भूल गये थे वो वचन
या मिथ्या थे आपके वचन
क्या नाम दूँ मैं आपको
किस नाम से प्रियतम पुकारूँ ?
माँ सीता ने राम को नहीं छोड़ा था
राम ने ही सीता का परित्याग किया
मैं भी तो परित्यक्त हुई आज
चुपके से छोड़कर निकल चले ।
नारी ही क्यों परित्यक्ता होती है
युगों युगों से छलती आयी है
चरित्र परीक्षा उसने दी है
चरित्र विच्छेदन उसका हुआ है,
मैं बाधक बनी आपके सिद्धि मार्ग में
ये प्रश्न मुझे बहुत चुभता है,
बता देते यदि पहले मुझे
आरती वंदन कर आपको विदा करती,
नारी तो पति की अनुगामिनी होती है
पति के पद चिन्हों पर चलती है
अभागी यशोधरा अब क्या करे
मृत्यु वरण भी नही कर सकती
राहुल को मेरी गोद में छोड़ चले ।
क्या जानोगे नारी की विरह वेदना
जाओ अपने मुक्ति मार्ग की खोज करो
लांछन मुझ पर जग न डाले
यशोधरा पति के मार्ग में बाधक बनती है ।
लौटोगे निश्चित ही एक दिन
तथागत बुद्ध बनकर,
पर ये न सोचना, मैं तुमसे मिलने आऊँगी
परित्याग तुमने किया है , तुम ही मुझे पुकारोगे
क्षमा करो मेरी यशोधरा!!
आ अब हम साथ चलें ।
अब माँ का धर्म निभाऊँगी
पति विरह पीड़ा राहुल को नहीं जताऊँगी,
नहीं चाहिए राज सुख, राज पाट,
फटे वस्त्रों में शेष जीवन बिताऊँगी ।
नारी का सृजन ही होता
त्याग और बलिदान के लिए,
जाओ गौतम जाओ, जाओ प्रियतम जाओ
सत्य मार्ग की खोज करो,
यशोधरा की विरह वेदना
नेत्र अश्रुओं से बह चले !