चलो लौट चलें, बचपन की गलियों में,
जहाँ हँसी बस हँसी थी।
जहाँ मन कभी नहीं थकता,
और समय भी रुकता था॥
गली में दौड़ते थे हम दोस्त,
हँसी और शोर का था मेल।
छुपा-छुपी, किले बनाना,
मन की यही थी सबसे खेल॥
सुनहरी धूप में हाथ पकड़े,
साइकिल पर दौड़ते हम।
सड़क किनारे जंगली फूल,
उनकी खुशबू अब भी याद है मुझको॥
खट्टे-मीठे आम, जलेबी की मिठास,
दोस्तों संग बंटते लड्डू।
हर लम्हा जैसे ठहर गया,
समय भी कभी थम जाता था॥
मिट्टी की खुशबू, बारिश की बूंदें,
कागज़ के पत्तों पर गिरी।
सपनों की उड़ान, मन की मस्ती,
सबकुछ बचपन की कहानी है॥
चलो लौट चलें, बचपन की गलियों में,
जहाँ हँसी बस हँसी थी।
जहाँ मन कभी नहीं थकता,
और समय भी रुकता था॥