*** मित्रों इस लेख में मेरे अपने व्यक्तिगत विचार है, जरूरी नहीं कि सभी एक जैसे हैं, कोई अपने ऊपर न ले, अन्यथा न ले, मेरा केवल यहां सच्चाई लिखने का प्रयास भर है ॥
मित्रों!! लेखन एक कला है,, माँ शारदे का वरदान है,, सभी को ये कला नहीं आती, मन के भावों की ये अभिव्यक्ति है, जो लेखनी के माध्यम से काग़ज़ पर उतार दी जाती है जो जितनी बारीकी से, सुन्दर मनोहारी शब्दों से, शैली और विधान से सृजन करने में सक्षम होता है वही सही लेखक या कवि माना जाता है ! यह एक सतत प्रयास है, माँ शारदे की साहित्य साधना है जिसकी कोई सीमा नही, कोई समयावधि नही, किसी को कम ज्यादा नहीं आँकना चाहिए, लेखनी का सम्मान करना चाहिए, प्रोत्साहित करना चाहिये, सम्मान करना चाहिए, पर लेखनी के साथ कभी पक्षपात और विश्वासघात करना नहीं चाहिये !
बहुत ही हास्यास्पद लगता है कि आजकल साहित्यिक संस्थाओं द्वारा प्रतिदिन बोरा भर भर कर सम्मान पात्र बाँटे जाते हैं, प्रश्न ये है कि क्या वे सभी वास्तव में सम्मान पाने के हकदार हैं ?? पता नहीं मुझे क्यों लगता है कि ये उस सम्मान का ही अपमान है जिसके नाम से साहित्य शिरोमणि की उपाधि दी जा रही है, कहीं कालीदास सम्मान पत्र, कहीं तुलसीदास सम्मान पत्र, कहीं सरस्वती सम्मान, कहीं साहित्य शिरोमणि सम्मान,, ऐसे नामों की बहुत ही लंबी फ़ेहरिस्त है, इसकी गणना करना आसान नहीं है और हम भी ऐसे सम्मान पत्रों को बाक़ायदा मढ़ा कर ड्राइंग रूम की शोभा बढ़ाते हैं और गौरवान्वित होते है !
आखिर हम अपनी अंतरात्मा में क्यों नहीं झाँकते कि नहीं . ..नहीं.. बिल्कुल नहीं.अमुक सम्मान मेरे लिए न्याय संगत नही,. मैं इसका हकदार नहींमैं इसका सही पात्र नही ! सम्मान देने वाला भी नहीं सोचता है कि हम क्या बांट रहे हैं, किसे दे रहे हैं और क्यों दे रहे है, किस मानक पर अमुक व्यक्ति खरा उतर रहा है ?? कोई कमेटी नही, कोई निर्णायक मंडल की सहमति नही.. ..बस फोटो का ढाँचा बना लिया और सम्मान पत्र में नाम ठोंक दिया और वितरित कर दिया ! चाहे आनलाइन हो या आफलाइन हो, हर पटलों से सैकड़ों सम्मान पत्र रोज जारी हो रहे हैं, जारी करने वाले को स्वयं भी अहसास नहीं कि वो क्या दे रहा है और किसे दे रहा है, यही नहीं सम्मान पत्र आजकल बाजार में खूब ख़रीदे और बेचे जा रहे हैं और हम इसको खूब बढ़ावा दे रहे हैं क्योंकि एक धंधा बन गया है बैठे बैठाये पैसे कमाने का ,,,बड़े साहित्यकार को बड़ा सम्मान चाहिए, बीच वाले को मध्यम दे दो और सामान्य वाले को जैसा नाम वैसा ही सामान्य सम्मान पत्र पकड़ा दो ,,,,उसी में खुश हो जायेगा.. फेसबुक पर ही तो डालना है ..फेसबुक के साथी तो वाह वाह कर ही देंगे ।
यही कारण है कि मुफ्त में चाहे शिक्षा की डिग्री हो, चाहे साहित्य सम्मान पत्र हो, या जीवन में कोई भी कार्य हो, जिसमें हम निपुण नहीं हैं , ज्ञान नहीं है, हुनर नहीं है तो सब डिग्रियाँ बेमानी है ! अगर हम स्वयं की दक्षता को सिद्ध कर नहीं सकते तो ऐसे प्रमाण पत्र केवल अलमारियों में सजाने के काम में आते हैं, दूसरों की आँखों में धूल झोंकते हैं और ऐसे सम्मान पर वो मेडल खुद हँसता है ।
एक सज्जन बता रहे थे कि उनके पास इतने सम्मान पत्र हैं कि बोरे में स्टोर में पड़े हुए हैं, दो तीन कमरों में कहाँ इतना स्थान है कि उसे संजो कर रखे,, पर परेशान हैं कि अमुक कार्यक्रम में मुझे सम्मानित नहीं किया गया .. भाई क्या करेंगे ये सब बटोरकर.. .आपके जाने के बाद जरूरी नहीं कि आपके बच्चे इसे आपकी धरोहर माने, अगर धरोहर नहीं मानते हैं तो स्वयं सोच लें .ये कहां जायेगें । इसलिए मेरे विचार से परेशान होने की जरूरत नहीं है कोई आपकी पीठ नहीं थपथपाता है तो शीशे के सामने खड़े हो जाइये और अपनी पीठ स्वयं थपथपाये और अपनी आत्मा से ये कहें कि तुमने वास्तव में आज बहुत उत्कृष्ट कार्य किया है,, you have done a good job today , मैं क्या हूँ .. स्वयं को मैं ज्यादा जानता हूँ .दूसरा भला क्या जानेगा।
आजकल तथाकथित डाक्टर की उपाधि भी काफी प्रचलन में है, पूंछना पड़ता है भाई कौन वाले डाक्टर हो?? सर्जरी वाले हो ..या साहित्य की सर्जरी वाले हो !! कल तक जो बंदा ग्रेजुएट भी नहीं था आज डाक्टर की मानद से विभूषित है, साक्षात वाचस्पति है, देव तुल्य है..केवल पहली पंक्ति में स्थान मिले, कुछ न कुछ बोलने की कला तो मिल ही जाती है , दसवीं पास भी फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोल लेता है, बहुत बड़ा नेता बन जाता है , अनेकों ऐसे प्रमाण हैं !
ऐसी बात भी नहीं है कि अनपढ़ ज्ञानी नही होता ,, बहुत से कवि और श्रेष्ठ जन जो पूर्व में ज्यादा पढ़े लिखे भी नहीं थे पर अपने क्षेत्रों में अच्छा नाम कमाया है, आज भी हम उनका अनुसरण करते हैं, उनके ज्ञान के सामने दुनिया नतमस्तक होती है क्योंकि वास्तव में वे ज्ञानी रहे, दक्ष रहे और सही माने में वे ही सम्मान के पात्र हैं .यहां बात हम कर रहे है मिथ्या ज्ञान की, मिथ्या सम्मान पत्र की, मिथ्या जीवन जीने की,, स्वयं को न आंकलन करने की.कि कहाँ पर हम खड़े है !
मित्रों!! झूठ का बाजार बड़ी द्रुत गति से दौड़ता है, झूठ की चाल बहुत तीव्र होती है.. सज्जन व्यक्ति तो बेचारे नेपथ्य में बैठे है, पर्दे के पीछे से कभी कभी बाहर मुँह निकालकर झाँक लेते हैं कि जरा देख सामने वाले को,, सुन लें उसके सुन्दर विचार. पर निराश होकर वापस चले जाते है । वे बेचारा करे तो क्या करे,, मजबूरी ही तो है देखने सुनने को विवश हैं, झूठी योग्यता पर ताली भी तो नहीं बजा सकते आखिरकार यह सोचकर कि “ मौनम् श्रेयस्करम् “ का सिद्धांत ही उचित है, चुप बैठ जाते हैं ।