रे मन तू चिंता मत कर

रे मन ! तू चिंता मत कर !!

चिंता होती चिता समान तन मन को करती जर्जर

बड़े भाग्य से मानव तन मिलता इसे व्यर्थ तू न कर

यह जीवन अनमोल बहुत है प्रभु की अद्भुत देन है

आंक तू जीवन के मूल्य को हर पल ख़ुशियों में भर ।

चिंता मन में जब सताये बैठ जा प्रकृति के मध्य में

देख पक्षियों की किलकारियाँ, खेलते लगते सुंदर

कौन सा है घर बार उनका, पर ग़मों से दूर वे रहती

मानव ही ऐसा प्राणी है जिसको लगता सब कमतर ।

जो ख़ुशियाँ को खोता है ग़म को ही पाले रखता है

सार्थक जीवन वो जीना नहीं, जीते जीते वह मरता है

मत अनुसरण कर ऐसे लोगों का जो जीवन ढोते हैं

जी ज़िंदगी अपनी शर्तों पर, ख़ुशियों को कम न कर ।

हरफनमौला बनकर जो जीता है मस्त ज़िंदगी जीता है

आज की वह सोचता है कल की चिंता नहीं करता है

धन दौलत उतना ही चाहिए, जीवन जिसमें चल जाये

जो भी मिल जाये जीवन में, उसमें ही संतुष्ट रहा कर ।

दुनिया में कष्ट अनेकों है, ख़ुशियों की भी कमी नही

आनंद ही आनंद है केवल सोच को सकारात्मक रख

प्रभु भक्ति में तू मन लगा, कर्म को प्रभु को अर्पित कर

फल देने वाला तो ईश्वर है, रे मन तू चिंता मत कर ।

Leave a Comment