मित्रों!! बहुत दिनों से कोई लेख नहीं लिखा था आज लिखने बैठ गया तो एक नया विषय मन में उभर आया - अहम् की भावना, तो बढ़ते हैं इसी विषय पर ।
पता नहीं कोई अहम् की भाषा बोलता है मैं ये कर डालूँगा, मैं वो कर डालूँगा, मुझसे पंगा नहीं लेना, तुम्हें बहुत मंहगा पड़ेगा, पता नहीं मैं क्या चीज़ हूँ ,, बड़े बड़े हमारे मुट्ठी में हैं वगैरह वगैरह, तमाम डायलॉग प्रचलन में हैं , भाई मुझे तो ऐसी भाषा बिल्कुल ही नहीं भाती है ! भाई स्वयभूं नहीं हो आप !! तुम भी एक मानव हो, तुम्हारा समय कब करवट बदल लेगा,, सोच भी नहीं पाओगे ! काल से डरो एक साधारण इंसान बन कर ही रहे ।
ऐसी सोच वालों को ज्ञानी की उपाधि तो नहीं दी सकती, हाँ मूर्ख ही माना जायेगा ! एक सज्जन से मिलने गया था,,,दो घंटों की मुलाक़ात में केवल अपना ही गुणगान गाया,, पता नहीं कितने आई ए एस / आई पी एस/ नेताओं के नाम बता डाले, वे सब मेरे चेले हैं,, मैं सुनता सुनता थक गया, फिर उठकर वहां से ये बोल कर चला गया कि भाई कोई ऐसी जरूरत होगी तो आपसे मिलने आऊंगा फ़िलहाल मुझे इसकी जरूरत नही ।
अहम् एक मानसिक बीमारी है, हमारे मन के सोच की संकीर्णता है, ऐसा व्यक्ति स्वयं को कमज़ोर समझता है पर दिखाना चाहता है कि मैं बहुत सामर्थ वान हूँ बहुत धनवान हूँ !! सोचो खुदा न ख़ास्ता कोई ज़रूरत पड़ जाये तो ये पल्ले भी झाड़ लेगा क्योंकि झूठ बोलना आदत है । अगर वास्तव में ही सामर्थ्य वान है तो समाज के लिये कुछ अच्छा कर दे, लोग बिना कहे प्रशंसा करेंगे और कीर्ति मिलेगी ।
सबसे ज्वलंत उदाहरण के तौर पर आजकल ट्रम्फ को ही देख लीजिए विश्व का चौधरी बना हुआ है, मैं सौ प्रतिशत टैरिफ़ लगा दूँगा, मैं पाँच सौ प्रतिशत टैरिफ़ लगा दूँगा,, रूस को धमकाता है कि पचास दिन का समय देता हूँ संभल जाओ,, अब धीरे धीरे सभी इस बंदरघुडकी के अभ्यस्त हो चुके हैं, डरना बंद कर दिये हैं यहाँ तक कि कई देश अमेरिका के ख़िलाफ़ लामबंद हो रहे हैं ! महाशय को एक नया शौक उपजा है विश्व शांति ख़िताब लेने का,, हर देश को लड़ाता है हथियार बेचता है फायदा उठाता है और सीज फायर करवाता है ,, हाँ शांति तो नहीं मिलने वाली परन्तु उल्टे सीधे बेतुके बयानों से अशांति और बढ़ गयी है, दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ रही है । ऐसे अकड़ बाज इंसानों के लिये क्या रास्ता है ? मिथ्या अहम् में और चौधरी पन में संसार को गर्त में डाल रहा है ।
अहम् से ग्रसित लोग हर क्षेत्रों में हैं कोई क्षेत्र अछूता नहीं है हमारा साहित्य समाज भी इस अहम् भावना से बुरी तरह ग्रसित है, बड़े बड़े विद्वान और साहित्यकार भी अपने मिथ्या अहम् से बाहर नहीं आना चाहते और स्वयं को महा ज्ञानी और चौधरी समझते हैं । आदरणीय शब्द बोलने के लिए हैं, पीठ पीछे अशोभनीय टिप्पणियाँ की जाती है , केवल चेहरे पर मुखौटा है, पर चरित्र काला दिखता है ! एक महान सज्जन बोले - मैंने अमुक को बनाया है, मैंने उसे प्रसिद्धि दी है, मुझसे टकरायेगा तो कहीं न नही रहेगा आदि आदि,, भाई क्या वह व्यक्ति मूर्ख है ?? अपने ज्ञान से ही तो आगे बढ़ा है किसी मूर्ख को विद्वान बना सकते हो क्या ?? क्यों ऐसी भाषा बोलते हो ?? मैं किसी विशेष व्यक्ति के ऊपर ये लेख नहीं लिखता हूँ पर ये कटु सच्चाई है कि हम अहम् से बाहर नही निकल पा रहे है, ये “मैं” शब्द बहुत ही घातक है, स्वयं का ही विनाश करता है ।
रावण की सोने की लंका हनुमान जी ने जला दी कि अभी भी ये संभल जाये, भगवान राम के सामर्थ्य को समझ ले, आने वाले विनाश को समझ ले पर मूर्ख रावण नहीं चेता, अहम् में जीता रहा और पूरा परिवार का संहार करवा दिया! वो रावण तो मर गया पर लगता है अपना कीटाणु हमारे भीतर घुसा गया । यही लगता है हम रावण के वंशज हैं !!
मित्रों!! हमें राम बनना है रावण नही । भगवान राम के दिखाये पथ पर चलना है तभी राम राज्य आयेगा ।
कवि
एक स्वतंत्र लेखक, समीक्षा कार, रचनाकार
नोएडा, उत्तर प्रदेश