हे हरि !तेरे कृपा बिन मन का भ्रम न जाये
बिन बांधे मैं स्वयं बंधा हूँ
तोते की तरह परवश पड़ा हूँ
परमात्म तत्व ज्ञान बिना
पीड़ा से मुक्ति कैसे पाये ।
वेद गुरू संत और स्मृतियाँ
एक स्वर से सब यही कहते हैं
यह दृश्य मान जगत असत् है
असत् को सत् समझ न पाये ।
मैं और मेरा का भान प्रबल है
जीव ग्रसित है मोह पाश में
असत् जगत को सत् मान रहा
मन का भ्रम कैसे यह जाये ।
संसार असत् है तो ताप असत् है
तीनों ताप तब सत्य कैसे लगते
मृगतृष्णा का जल सत् ही दिखता
आँखों का भ्रम कैसे यह जाये ।
स्वप्न में सोया हुआ मानव
जैसे समुद्र में डूबने लगता है
जब तक वह निद्रा से न जागे
नौकाओं से भी पार न पाये ।
जीव अज्ञान निंद्रा में अचेत है
जग दिखता एक मनोरम स्थल है
जब तक प्रभु की कृपा न पाये
मन का यह भ्रम कभी न जाये ।
न्वायडा, उत्तर प्रदेश
@सर्वाधिकार सुरक्षित स्वरचित रचना