क्या छोड़ूँगा पीछे, क्या छोड़ूँगा पीछे
सिर्फ़ शब्द मेरे साथी हैं,
लेखनी मेरी पूंजी है,
यही मेरी दुनिया है, यही मेरा विश्वास है।
सोच रहा हूँ, अगर गया,
तो क्या छोड़ूँगा अपने पीछे?
खाली कमरे, सुनती दीवारें,
और मेरे शब्द जो जीते रहे।
भागम-भाग रहा है ये जीवन,
संघर्षों से ही रहा नाता है।
ठोकर खाकर समझा मैंने,
अकेलापन भी साथी बन जाता है।
अपने पास कुछ नहीं बचा,
बस एक लेखनी है, मेरा सहारा।
जो खो गया, जो पीछे रह गया,
लेखनी ही उसका साथी बनती है।
क्या छोड़ूँगा पीछे, क्या छोड़ूँगा पीछे
सिर्फ़ शब्द मेरे साथी हैं,
लेखनी मेरी पूंजी है,
यही मेरी दुनिया है, यही मेरा विश्वास है।