हे हरि कहाँ जाऊँ तुम्हें छोड़ कर

हे प्रभु ! कहाँ जाऊँ मैं तुझे छोड़ कर

कोई और ठिकाना नहीं जगत में

भीतर भरा है खोट ही खोट

अपनी करनी अपने हाथ से बिगाड़ी

कहाँ जाऊँ मैं तुझे छोड़ कर ।

मैं तो तुझसे विमुख रहा

नेत्र होते हुए भी दृष्टि हीन रहा

पर कौन हे तेरे सिवाय मेरे

कहाँ जाऊँ मैं तुझे छोड़ कर ।

मैं दीन हूँ आप दीन बंधु

मैं पतित हूँ आप पतित पावन

आप प्रणतपाल मैं प्रणत हूँ

कहाँ जाऊँ मैं तुझे छोड़ कर ।

राम नाम की ओट बड़ी भारी

राम नाम की रट ले ली मन में

मेरी करनी प्रभु अब तेरे हाथ में

कहाँ जाऊँ मैं तुझे छोड़ कर ।

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