बिक रहा सब कुछ पैसों के वास्ते

कैसा ये संस्कार है कहाँ जा रहे हैं हम

हर रिश्ते बिकने लगे हैं पैसों के वास्ते ।

बिक रहा ईमान है बिक रहे हैं रिश्ते

बिक रही अब कोख है पैसों के वास्ते

मासूम को मालूम नहीं कौन उसकी माँ ?

रोता बिलखता वो रहा ममता के वास्ते ।

बिक रहा सिंदूर है न रहा विश्वास

सात फेरे भी लिया कर दिया पति खलास

सती सावित्री न रही जो लड़ गयी थी यम से

खींच कर लाई पति को तोड़कर यम पाश ।

कैसा ये संस्कार है कहाँ जा रहे हैं हम

हर रिश्ते बिकने लगे हैं पैसों के वास्ते ।

पाखंड ही पाखंड है हर चीज की है दर

धर्म भी बिक रहा पैसों के वास्ते,

प्रभु की सृष्टि ये हो रही विखंडित

बिक रहे भगवान हैं पैसों के वास्ते ।

जाये तो जाये कहाँ घर भी न रहा सुरक्षित

बिक रही है बेटियाँ पैसों के वास्ते,

कैसा ये अधर्म है कैसा ये पापाचार

आज संस्कार बिक गये पैसों के वास्ते ।

धन ही प्रधान है, धर्म हुआ विलुप्त

हर रिश्ते बिकने लगे हैं पैसों के वास्ते ।

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