Umanath Tripathi
यही मेरी असलियत
यही मेरी असलियत✍️ये नाम,ये पद, ये शोहरत क्या है और क्या करे इसका ? सब शून्य ही तो है, केवल लोक व्यवहार के लिए है। मत उलझो मिथ्या भ्रम में, इसी में चक्कर लगाते रहोगे, कुछ हाथ में नहीं रहेगा । न मैं लेखक हूँ, न मैं गायक हूँ न शिक्षक हूँ न हूँ पत्रकारन … Read more
क्या पता कल रहें या न रहे
हमें हर रिश्ते संजोकर रखना चाहिए क्या पता कल रहें या न रहें ।क्यों बना रखे हो मन में दूरियाँ आओ बैठो कुछ बात करें कुछ तुम कहो कुछ हम कहें क्या पता कल रहें या न रहे याद करें वो बचपन के दिन कैसे साथ हम रहते थे एक दूजे की पकड़ कर उँगली … Read more
मैं कोई कवि नहीं
मैं कोई कवि नही हूँ न मैं कवि कहलाना चाहता हूँ लिखता रहता मन की बातें मन की बात सुनाता हूँ । छंद विधान मुझे न भाये न मैं इसकी राग अलापता हूँ सच्चाई पर मेरी लेखनी चलती भाट राग न सुनाता हूँ ।भूखे पेट बच्चों को देखता उन पर द्रवित मैं हो जाता हूँ … Read more
सूखा पर्वत और हरी घाटी
वो सूखा पर्वत कहता है ऐ मेरी प्यारी घाटी ! तू तो मुझसे सुन्दर है हरियाली से तू है भरी हुई पर मैं तो एक पौध हेतु तरसता हूँ हाँ चीड़ का कोई एक आध वृक्ष 🌲 उगाकर मैं भी गर्वित होता हूँ ।मुझे ये सूखा पन अच्छा नहीं लगता तुझे देख कर दिल बहलाता … Read more
जंगल बोलता है
कहो मुसाफ़िर ! कहाँ से आये हो घने जंगल के इस अंधकार में क्या ढूँढने आये हो ? क्या पाओगे यहाँ सिवाय पेड़ों के झुरमुटों के जहाँ वनस्पतियाँ अपने आप उगती हैं जहाँ वनस्पतियों का रस पीते हैं कीड़े,जहाँ पराग मकरंद मिलता है मधुमक्खियाँ रसपान करती हैं भौंरे स्वच्छंद गुंजायमान करते हैं हिंस्र प्राणी भी … Read more
झाड़ी बोलती है
इक झाड़ी को देख रहा था झाड़ी मुझसे कहती है क्यों डरते हो तुम मुझसे कि मेरे अंदर काँटे हैं मत डरो मेरे काँटों से ये मेरी सुरक्षा करते हैं आओ बैठो मेरे पास मन की शांति मैं तुमको दूँगीस्वादिष्ट फल हैं मेरे पास उनको खाने को दूँगी ।पर तू मानव तो बहुत चतुर है … Read more
फूफा चरित्र
क्यों ग़ुस्सा करूँ बार बार क्या मैं कोई फूफा हूँ जो बात बात पर तुनक जाये और कहे मैं अब चलता हूँ ।हर बात अपनी मनवाये अपने मन की वो करवाये उनके मन की करो न बातें छोड़ दूर बैठ वो जाये ।सोचता रहता आयेगा कोईकोई मना कर ले जायेगा मान मनौव्वल का फूफा रोगी … Read more
मेरी साइकिल
चल चल मेरी साइकिलखुर्र खुर्र खुर्रतू तो रही मेरे बचपन की साथी तय करती मंजिलें फुर्र फुर्र फुर्र ।सरपट दौड़ती रहती थी टेढ़ी मेढ़ी पगडंडियों पर तेरे भरोसे चल देता था कोसो मंजिल तय करता था, न तू थकती थी न मैं थकता था कैसा सुन्दर ये गठबंधन था । पैडल पर पैडल मारता था … Read more