धरती की पुकार

धरती की पुकार

धरती हूँधारण करती हूँ, पालती हूँ, पोसती हूँ,

इसीलिए तो मैं धरती माँ कहलाती हूँ।

पर अब थक गई हूँ

अपनों के ही पाप ढोते-ढोते।

छोड़ गए राजा परीक्षित भी मुझे असहाय,

कलि के प्रकोपों को सहने के लिए।

गौ रूप में भी सुरक्षित नहीं,

सरेआम कटती हूँ,

किससे कहूँ अपनी वेदना

गौ चारे और जल के बिना मरती हूँ।

अतिक्रमण, दोहन, प्रदूषण,

छलनी कर रहे मेरे सीने को।

कट रहे सब हरे-भरे वन

विकास के नाम पर।

जल प्रदूषित, वायु प्रदूषित,

पर्यावरण का कण-कण आज प्रदूषित।

माँ गंगे का पावन जल भी

जहर से आज परिपूरित।

कहीं सूर्य ताप से तपती हूँ,

कहीं इन्द्र के प्रकोप को झेलती हूँ।

क्या दूँगी अब तुम्हें, हे मानव!

तुमसे ही तो मैं छलती हूँ।

मैं धरती माँ हूँजीवन देती हूँ,

पर जीवन अब संकट में है।

अभी सुधर जा, हे मानव!

वरना आने वाला समय

सुनिश्चित विनाश की कथा कहेगा।

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