राम नाम रस पी ले रे मन,
तेरे सब दुख मिट जाये
राम बिना शांति कहाँ पाये,
राम बिना शांति कहाँ पाये
माया के मेले में भटका मन,
पथ का पता तू पा न सके
सुख की चाह में दौड़ा फिर भी,
दुख का काँटा मन को चुभे
एक घड़ी को बैठ ज़रा मन,
झाँक ज़रा तू भीतर अपने
सुख की चाबी भीतर ही प्यारे,
बाहर क्यों भटके जाये
कभी अभिमानी बनता मन,
कभी आसक्ति में तू अटके
कभी क्रूर विष की धारा में,
डूब उतराता तू भटके
जीवन रूपी खेत उजड़ता,
नियम धर्म सब भूल गया
राम भजन से सिंचित कर दे,
फिर सौभाग्य अंकुर फल जाये
तीनों ताप सताते तन को
आधि व्याधि उपाधि कहायें
प्रभु चरण में जो आ बैठे,
दुख के जाल स्वयं कट जाएँ
राम कृपा की धूप पड़ी जब,
भय का तमस सभी हट जाये
राम चरण से सावन बरसे,
सूखे मन में हरियाली छाये
राम नाम रस पी ले रे मन,
तेरे सब दुख मिट जाये
राम बिना शांति कहाँ पाये,
राम बिना शांति कहाँ पाये