जंगल बोलता है

कहो मुसाफ़िर ! कहाँ से आये हो

घने जंगल के इस अंधकार में क्या ढूँढने आये हो ?

क्या पाओगे यहाँ

सिवाय पेड़ों के झुरमुटों के

जहाँ वनस्पतियाँ अपने आप उगती हैं

जहाँ वनस्पतियों का रस पीते हैं कीड़े,

जहाँ पराग मकरंद मिलता है

मधुमक्खियाँ रसपान करती हैं

भौंरे स्वच्छंद गुंजायमान करते हैं

हिंस्र प्राणी भी रहते यहाँ

पर शासन चलाती है क़ुदरत,

क्यों दख़ल देने आये हो

प्रकृति की इस स्वतंत्र सत्ता में ।

झाड़ियों को साफ़ तुमने किया वृक्षों को काट तुमने डाला

बना लिया हमारे बीच विश्रामालय जहाँ रात्रि बिताने आये हो ।

यह शरणस्थली था

मछलियों और बतख़ों का

सब कुछ यहाँ कितना अद्भुत,

शांत और अर्थपूर्ण!

कैसे उन्माद में डूबेंगे पक्षियों के झुंड यहाँ

कैसे नींद आएगी उन्हें?

ये झील लेटती है

साँझ के शांत आलोक में,

लेटी है बहुत गहरे, बिना हिले चमकती हुई

चमक रहा पारदर्शी अथाह जल

चमक को तुम मिटाने आये हो ।

ये पंक्तियों में सीधे खड़े चीड़ के पेड़ मोमबत्तियों की तरह,

ये देवदार के वृक्ष प्रकृति का वरदान उन्हें काटने आये हो ।

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