चलते चलते यूं ही कहां आ गए हम
ज़िन्दगी के ढलान पर खड़े हो गये हम,
जीवन की आपाधापी में समय फिसल गया है
कहाँ से चले और कहाँ आ गये हम ।
मृगतृष्णा के पीछे भागता ही रहा हूँ
उलझता रहा सतत संघर्षों में जीवन,
इच्छायें बहुत हैं पूर्ण कर पाया न कोई
आत्मिक संतुष्टि कहां खो दिये हम ।
सूर्योदय के किरणों के साथ मै चला था
चलता रहा हूँ दौड़ता मैं रहा हूँ ,
सूर्य ढल गया है अन्धेरा घुप हुआ है
अन्धेरी गुफा में कहाँ खो गये हम ।
शरीर थक गया है इन्द्रियां शिथिल हुई है,
जोश की भावना कुंद सी हो गई है,
नहीं सूझ पड़ता कैसा दिशा भ्रम हुआ है
पूरब से चले थे पश्चिम आ गये हम ।
सच्चाई के पथ से भटक सा गया हूँ
चौराहे पर आकर खड़ा हो गया हूँ,
न सूझ पड़ता है किस ओर आगे जाना
चलते चलते यूं ही कहां आ गए हम ।