अभिमन्यु ! वीर अभिमन्यु !
चक्रव्यूह वेधक अभिमन्यु !
अद्भुत कौशल, अद्भुत शक्ति,
नमन करूँ तुझे हे अभिमन्यु!
बढ़ चला रण में वह युवा वीर,
ध्वजा थाम अम्बर हुआ अधीर
तोड़ दिये सप्त चक्रव्यूह के द्वार,
निशब्द खड़े सब रण-वीर अपार।
गर्भ में सीखा धनुर्विद्या सार,
माँ के सोने से छूटा पार,
काश न आई होती निद्रा
वीर का पूर्ण होता चित्रा।
सोलह बसंतों का था वो लाल,
लड़ा अकेला रण में काल,
कायरों ने वार किया छिपकर,
टूटे नियम, लाज सब मिटकर।
वीर अमर होते हैं जग में
नाम रहे युगों तक मग में,
कायर वो जो छिपकर वार करें
वीर वही जो सत्य पे मरें।
प्रश्न उठे मन के भीतर,
हे वासुदेव ! जग के हितकर!
आप नियंता, सर्वद्रष्टा,
फिर यह लीला क्यों अश्रु-वृष्टा?
कम उम्र में इतिहास लिखा
ज़रूर कोई वो देव रहा,
धरती पर जन्म उसने लिया
महाभारत का वीर रहा॥
अभिमन्यु ! वीर अभिमन्यु !
चक्रव्यूह वेधक अभिमन्यु !
अद्भुत कौशल, अद्भुत शक्ति
नमन करूँ तुझे हे वीर अभिमन्यु!