वट वृक्ष की डाली

टूट जाती जैसे इंसान की बाँहें,

टूट गयी वट वृक्ष से डाली,

क्या करती कुछ समझ न पायी,

अलग हुई वट से वह सुन्दर डाली ।

हरे भरे पत्तों की घनी वह डाली

हर इंसान को छाया देती थी,

पर इंसान की छुद्र पिपासा ने,

काट दिया वृक्ष की वह डाली ।

हाथ पाँव यदि कट जाये

इंसान अपंग हो जाता है,

वृक्ष भी तो संजीव होते हैं,

उनको भी होती प्यारी अपनी डाली ।

वट वृक्ष शून्य सा खड़ा रहा,

कम्पित हृदय, भयभीत खड़ा,

हृदय वेदना कैसे कहता,

देखता रहा टूटती पोषित डाली ।

रोती रही वह बिलखती रही,

प्राणों की भीख माँगती रही,

क्रूर इंसान को तनिक न दया आयी,

टुकड़े टुकड़े हो गई वह डाली ।

अपने जड़ से जब अलग हुई,

अंश हीन हुई, अस्तित्व हीन हुई,

आजीवन परोपकार के बदले में,

बलिदान दे गयी वह प्यारी डाली ।

इंसान स्वयम् को स्वयंभू समझता है,

वेदना वृक्ष की नहीं सुनता है,

दुष्परिणाम इसका भयंकर होगा,

संतप्त हृदय से श्राप दे गयी वह डाली ।

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