उठो द्रौपदी वस्त्र सँभालो
चक्र धारी अब नही आयेंगे
तुम्हीं को लेना होगा लोहा
इन नरभक्षी इंसानों से ।
छोड़ो मेंहदी भुजा सँभालो
खुद ही चीर बचाओ अपनी
बन जाओ तुम रण चंडी
भिड़ जाओ अब तूफ़ानों से ।
कब तक आस लगाओगी
कृष्णा पुकार पर दौड़े आयेगे
यह तो द्वापर युग नही है
न ही रथी अब महाभारत जैसे ।
शकुनि पाँसा फेंक रहा है
युधिष्ठिर को ललकार रहा
पांडव सब हाथ बाँधे बैठे हैं
कैसे बचेगी तू दुशासन से ।
धृतराष्ट्र तो आँख का अन्धा था
आज का प्रशासन गूँगा बहरा है
किससे रक्षा मांग रही तुम
कलियुगी कौरवी दरबारों से ।
होंठ सिले है सभी के आज
कानों पर सबके पहरा है
कौन पोंछेगा अब तेरे आंसू
खुद ही दिख रहे हैवानों जैसे ।
स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे तेरी क्या लाज बचायेंगे
क्या जाने नारी की अस्मिता
सब मिले हुये हैं दलालों से।