उठाया गोवर्धन चक्रधारी ने
अपनी एक ऊँगली के बल पर,
पर चुना क्यों कनिष्ठा को
उसकी सुन्दर कथा सुनाता हूँ ।
कान्हा ने पूँछा ऊँगलियों से
किस ऊँगली का प्रयोग करूं,
सब रखो पक्ष अपना अपना
निर्णय स्वयं तब मैं करता हूँ ।
अंगूठा बोला सबसे पहले
प्रभु मैं एक नर बलशाली हूँ,
बाक़ी तो हैं केवल अबलायें
इस कार्य के लिये सक्षम हूँ ।
तर्जनी बोली सुनो कृष्ण
मैं तो सबको चुप कराती हूँ,
शांत किसी को यदि करना है
मैं ही तो काम में आती हूँ ।
बोली मध्यमा अपनी बातें
आकार में सबसे मैं लम्बी हूँ,
शक्ति रखती हूँ सबसे ज़्यादा
इस कार्य हेतु मैं ही उत्तम हूँ ।
अनामिका ने रखा अपना पक्ष
मंगल कार्य पूरे होते हैं मुझसे,
तिलक लगाती हूँ मैं देवों को
मैं ही इसकी अधिकारिणी हूँ ।
क्रम आया अब कनिष्ठा का
बिन बोले चुप चाप बैठी थी,
बरबस नेत्रों से अश्रु छलक गये
बोली मैं तो सबसे छोटी हूँ ।
कोई भी तो मुझमें गुण नही
न ही कोई ऐसी शक्ति है,
नहीं पूँछता कोई मुझको
मैं तो केवल आप पर निर्भर हूँ ।
सुनकर भोली कनिष्ठा की बातें
चक्रधारी अति प्रसन्न हुये,
बोले कनिष्ठे! कितनी विनम्र है तू
विनम्रता का तो मैं क़ायल हूँ ।
उठाया गोवर्धन चक्र धारी ने
अपनी कनिष्ठा के बल पर,
चूर किया अहंकार इन्द्र का
कनिष्ठा को नमन मैं करता हूँ ।
यदि पाना है कुछ जीवन में
पहले स्वयं सरल विनम्र बनो,
सम्मान किया कनिष्ठा का
हरि लीला को नमन मैं करता हूँ ।