तू बस धर्म निभा ओ प्राणी

तू बस धर्म निभा ओ प्राणी,

फल की चिंता छोड़ दे।

कर्म ही है तेरा अधिकार,

मत सोच जीत या हार॥

हर मन भीतर कुरुक्षेत्र सजा है,

इच्छा–कर्तव्य युद्ध रचा है।

कभी धुंध छाई, राह न सूझे,

डगमग डोले जीवन रथ है॥

तू बस धर्म निभा ओ प्राणी,

फल की चिंता छोड़ दे।

भीतर बैठे कृष्ण कन्हैया,

सबका लेखा जोड़ दे॥

मन का अर्जुन प्रश्न उठाए,

क्यों ये पीड़ा, क्यों ये हार।

कृष्ण मुस्काकर वचन सुनाएँ,

कर्म ही है तेरा अधिकार॥

न त्याग में ही मुक्ति बसती,

न संग्रह में सुख अपार।

समभाव रख जो कर्म करे,

वही पाए भव से पार॥

जब फल का बंधन टूटे मन से,

कर्म बने तब पूजा-पाठ।

अंतर का कुरुक्षेत्र तब,

शांत गीता बन जाए साथ॥

तू बस धर्म निभा ओ प्राणी,

फल की चिंता छोड़ दे।

भीतर बैठे कृष्ण कन्हैया,

जीवन नैया मोड़ दे॥

Leave a Comment