तीन मुट्ठी तंदुल

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

मेरा कान्हा अब वह कान्हा नही

विश्व का प्रसिद्ध योद्धा है

नमन करते हैं तीनों लोक

त्रिलोकीनाथ कहलाता है

रखना है उसके प्रतिष्ठा का मान

खाली हाथ नही जाना है

हाँ मैं ठहरा एक ब्राह्मण गरीब

भिक्षा से केवल नाता है

माँगेगा न वह कुछ मुझसे

ऐसा मेरा गुरुकुल का नाता है

पर लाज शर्म की है बात

उसकी प्रतिष्ठा नही घटाना है

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

ग्रहण करें ये तंदुल की पोटली

घर की यह कुल पूँजी है

हर्षित हो ले जाओ आप

प्रभु केवल भाव के भूखे हैं

त्याग देते कौरवों का राजसी भोज

विदुर के घर का साग सुहाता है

सामर्थ्य नहीं देखते वे मित्रता के अटूट बंधन में

मित्रता प्रदूषित हो जाती जहां स्वार्थ बीच में आता है

कान्हा कान्हा जपते हो

पर मिलने से कतराते हो

मन में रखो केवल इक बात

अपने गुरुकुल सखा से मिलने जाना है ..

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

देवी ! सब ये हैं बचपन की बातें

अब वह एक सर्वश्रेष्ठ योद्धा है

वह नटखट कान्हा नही द्वारिकाधीश कहलाता है

सोचती पत्नी मन में पति का मन लिप्त सांसारिक भेदों में

मुक्त नहीं हो पा रहे हैं वे

प्रभु की प्रभुता को न पहचाना है

बोली पत्नी सुदामा से मतिभ्रम में हैं आप पड़े हुए

समय के वश में भला प्रभु कैसे

जग ने त्रिलोकी उन्हें माना है

प्रभु तो लीला धारी हैं नर रूप में लीला कर रहे

जिसके मन जैसी भावना

वैसा ही रूप प्रभु को दिखाना है ।

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

राधा का है वह मुरली वाला

नंद बाबा यशोदा का नटखट कान्हा

गोपियों के लिये माखनचोर है वह

जग ने सहस्र नामों से पुकारा है

अर्जुन का प्रिय सखा हैं वह

द्रौपदी का चीर हरण रक्षक

महाभारत का सूत्र धार है वह

सृष्टि का पालन हार है वह

आपके लिये तो ठहरे

वही बचपन के गुरुकुल सखा

याद करे गुरु कुल की बातें

अपने उसी सखा से मिलने जाना है

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

हंसकर बोले सुदामा पत्नी से

देवी ! इतना ज्ञान कहां से पायी हो

वे तो ठहरे मेरे बचपन के सखा

पर मेरे सखा को तुमने ही पहचाना है

परम प्रफुल्लित हुये सुदामा

अपनी पत्नी की सारगर्भित बातों से

उठा ली तंदुल की वह पोटली

बढ़ा दिए कदम द्वारिका की ओर

नहीं जानते थे उनका प्रिय सखा

कर रहा था प्रतीक्षा व्यग्रता से

अश्रुपूरित नयन, हर्षित मन

गुरुकुल सखा सुदामा से जो मिलना है

प्रिये ! दे दो मुझे कुछ भेंट कान्हा से मिलने जाना है

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