तेरी भक्ति बिन मोह न जाये

हे हरि ! तेरी भक्ति बिन मोह न जाये ..

प्रभु कृपा बिन न मोह दूर हो

न यह ग्रन्थिन माया जाये

वाचक चाहे कितना ज्ञानी हो

भव सागर पार कर न पाये ।

दीन दुखी जैसे भूख के मारे

खूब तड़पे और चिल्लाये

चित्र टंगे हो गृह कल्पवृक्ष के

चित्र देखकर भूख न जाये ।

षँटरस भोजन का स्वाद तभी है

जब स्वयं चखा यह जाये

व्याख्यान मात्र देने से ही

स्वाद का पता न चल पाये ।

मन में लिप्त विषयों की आशा

गुरू प्रवचन समझ न आये

तत्व ज्ञान के प्रकाश बिन

भटकन से जीव न मुक्ति पाये ।

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