दर दर भटकते फिर रहे
सुकून की तलाश में,
सुकून घर में ही बैठा मिला
पर न दिखा वह निगाह में ।
सुकून कोई वस्तु नही
जिसे हम बाजार से ख़रीद लें,
सुकून को यदि है ढूँढना
डूबकी लगाये गहरे ध्यान में ।
मिल जाता है दो पल का
सुकून बंद आँखों की बंदगी में,
वरना थोड़ा थोड़ा परेशान
तो हर शख़्स है अपनी ज़िन्दगी में ।
भाग दौड़ की यह ज़िन्दगी
भला रास किसे आती है,
सुकून कोई नहीं है ढूँढता
प्रकृति की शांत गोद में ।
सुकून है तो ढूँढ लें
मन्दिर की सीढ़ियों पर बैठ कर,
दो घड़ी ही सही
चित्त लगाये प्रभु के ध्यान में ।
सुकून है तो ढूँढ लें
कुछ करिये अनाथ बच्चों के लिये ,
दे दे कुछ ख़ुशियाँ उन्हें
सुकून दिखता उनकी मुस्कान में ।