शिव और शबरी का मिलन

बोले शिवजी माता शबरी से

“हे माते! खिला दे मुझे वे बेर,

जो प्रभु राम को तूने खिलाये थे।

दे दे यह भिक्षा मुझे, भिक्षुक रूप में,

तेरे द्वार पर आज मैं आया हूँ।”

तेरे प्रेम ने शिव को झुका दिया,

तेरे त्याग और समर्पण ने

भक्ति का नया मार्ग दिखा दिया।

ये भोलेनाथ भी आ पहुँचे तेरी कुटिया,

हे माते! दे दे वे बेर,

जो राम को तूने खिलाये थे।

बोली शबरी“हे भोलेनाथ!

वे बेर तो अब बासी हैं, जूठे हैं।

पाँवों में गति नहीं रही,

नयनों से कुछ दिखता नहीं।

अब तो मैं जा रही परमधाम,

जहाँ मेरे प्रभु राम बसते हैं।”

बोले शिवजी“हे शबरी!

मैं भी तो रामभक्त कहलाता हूँ।

प्रेम, प्रतीक्षा, त्याग और समर्पण की मूर्ति,

तुमसे मिलने आया हूँ।

तेरे उस प्रेम को देखना चाहता हूँ,

जो तूने प्रभु राम को चखाया था।

जो राम को अपना मान लेता है,

उसे मैं भी अपना मान लेता हूँ।

आज मैं भिक्षा माँगने आया हूँ

दे दे वे जूठे ही बेर मुझे।

बासी मत कहना, माता,

वो तो मेरे प्रभु का प्रसाद हैं,

उन्हें ही चखने आया हूँ।”

शबरी ने थमा दी टोकरी

“ले लो प्रभु! जितना मन चाहे।”

शिवजी ने बेर उठाए,

जैसे ही स्वाद लिया

बरबस नेत्र मूँद लिए,

मन तृप्त हो उठा।

होंठों से निकला

“हे शबरी! धन्य हुआ आज यह शिव,

तेरे इन बेरों को खाकर।

भक्ति न तर्क से आती है, न शास्त्र से,

भक्ति केवल समर्पण से आती है।

और तू तो समर्पण का ही रूप है।”

शिव वाणी सुन शबरी मौन रही,

नतमस्तक हो नेत्र मूँद लिए।

शरीर शांत हुआ, आत्मा राम में लीन हो गई।

शिव-पार्वती कुछ देर वहीं बैठे रहे

जैसे किसी अपने के जाने के बाद,

कोई प्रिय थोड़ी देर और

उसके पास बैठना चाहता हो।

जहाँ न कोई माँग थी,

न पाने की चाह,

बस प्रतीक्षा थी, समर्पण था,

और एक मौन मिलन का आनंद।

शबरी आज भी जीवित है

हम सबके भीतर।

बस ज़रूरत है त्याग और समर्पण की

जहाँ राम हैं, वहीं शिव हैं,

जहाँ शिव हैं, वहीं राम हैं।

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