सत्य की खोज में सिद्धार्थ से बुद्ध तक

संसार तो एक दृश्य-जगत है

देखने में अनुपम, आकर्षक, मोहक।

यह चंचल मन उसी में उलझा रहता है।

पर प्रश्न उठता है

यदि यह संसार इतना मनोहर है,

तो राजकुमार सिद्धार्थ

राजसुख छोड़ वन क्यों चले गए?

क्योंकि उन्होंने केवल राजमहल का वैभव देखा था,

उसके भीतर छिपे दुखों का सत्य नहीं।

यौवन देखा था, पर वृद्धावस्था नहीं;

चार कंधों पर उठी अर्थी देखी,

तो जीवन की नश्वरता का बोध हुआ।

मिथ्या जगत का मोह भंग हुआ,

वैराग्य जागा, आत्मबोध का दीप जला

और वही सिद्धार्थ

आगे चलकर भगवान बुद्ध कहलाए।

ईसा-पूर्व का वह समय,

कपिलवस्तु का राजपाट,

अकूत धन, स्वर्ग-सरीखा ऐश्वर्य

बीच युवावस्था में सब कुछ त्याग कर

सिद्धार्थ सत्य की खोज में निकल पड़े।

अपने केश काट डाले

वे केश जो संसार के दुख का भार

ढो नहीं सकते थे,

उन्हें संवारने का क्या प्रयोजन?

वर्षों तक भूखे-प्यासे भटकते रहे।

कंदराओं, गुफाओं, नदियों और पर्वतों में,

आश्रमों और मठों में ज्ञान की धूल फाँकते रहे।

हर एक ज्ञान के स्रोत में

अपने चित्त को डुबोते रहे

कि एक दिन वे दुनिया के दुखों का

उपचार ढूँढ लेंगे।

वीणा के तारों की तरह

उन्होंने अपने शरीर को साधा।

मेरुदंड मानो तनी वीणा का तार बन गया।

पीपल के नीचे तप में बैठा सिद्धार्थ

देवताओं से प्रश्न करता

“हे स्वर्ग के देवताओं!

बताओ, तुम्हारे रहते

दुनिया में दुख क्यों है?”

देवता मौन रहे।

थककर वे अपने भीतर उतरे।

अचेतन मन के गहरे सागर में।

जितना गहरे गोते लगाते,

उतना ही अनंत गहराई सामने आती।

अचानक चेतना में एक प्रकाश पुंज उभरा।

ऐसा लगा मानो ब्रह्मांड के

सभी ग्रह-नक्षत्रों का गुरुत्व

उनकी मुट्ठी में समा गया हो।

मन हल्का होता गया।

हवा में डोलते पीपल पत्ते सा

अस्थिर मन अचानक

गंभीर पर्वत की तरह स्थिर हो गया।

उसकी धमनियों में

संसार का समस्त दुख उतर आया

और उसी क्षण सिद्धार्थ

तथागत बन गए।

ज्ञान प्राप्त हुआ, करुणा उमड़ी,

आँखें अश्रु से भीग उठीं।

यही सिद्धार्थ आगे चलकर

बोधिसत्व बुद्ध बने।

ता-उम्र वे संसार को सिखाते रहे

शांति, अहिंसा, प्रेम और करुणा का अमर संदेश।

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