वो पंगत में बैठ के साथ साथ जेंवना
अपनों की संगत में रिश्तों को जोड़ना
यादें ही शेष हैं कुछ भी नही अवशेष है
संयुक्त परिवार चढ़ा स्वार्थ की भेंट है ।
दादा की लाठी पकड़ गलियों में घूमना
दादी का बलैया लेना माथे को चूमना
संस्कार और संस्कृति रग रग में बसते
चढ़ गया सब कुछ स्वार्थ की भेंट है ।
मनोरंजन के साधन आज हमारे पास है
ठहरे निर्जीव ये तो इनमें नही साँस है
आज गरमी में एसी और जाड़े में हीटर है
रिश्तों के माप हेतु स्वार्थ का मीटर है।
समृद्ध नहीं थे पर दस दस को पालते थे
खुद ठिठुरते कम्बल बच्चों पर डालते थे
बुजुर्गों की छत्र छाया में महफ़ूज रहते थे
उन्हीं पर वृद्धाश्रम की गिरी आज गाज है ।
मंदिर में हाथ जोड़ते रोज सर झुकाते हैं
माता-पिता को छोड़ वृद्धाश्रम में आते हैं
ईश्वर ने जिसे जोड़ा उससे हैं नाता तोड़ते
वे भीख नहीं माँगते वे हमारी जागीर हैं ।