स्त्री का श्रृंगार रूप में प्यारा,
पुरुष का श्रृंगार कर्म उजियारा।
दोनों ही प्रकृति के स्वर सुंदर,
एक स्नेह भरा, एक तेज हमारा।।
फूलों-सी कोमल, चाँदनी-सी निर्मल,
ममता में डूबी नारी की भावनाएँ।
आँचल में बसती दया की नदियाँ,
उससे ही महके जीवन की छायाएँ।।
रूप उसका जैसे कली का नज़ारा,
पुरुष का श्रृंगार कर्म उजियारा।।
पुरुष है साहस, विश्वास की मूरत,
उसके पथ पर दीपक जलते हैं।
ना गहनों का उसे अभिमान कभी,
उसके कर्म ही गहने लगते हैं।।
शक्ति का दीप, तप का धारा,
स्त्री का श्रृंगार रूप में प्यारा।।
एक बिना दूजा अधूरा लगता,
दोनों से ही सृष्टि सँवरी है।
ममता और पुरुषार्थ जब मिलते,
जीवन में तब ही रौनक भरी है।।
प्रकृति ने दोनों को दी है धारा,
एक स्नेह भरा, एक तेज हमारा।।