जीवित रहते ही, रिश्तों की कहानी हो गई,
जीवित रहते ही, मिलते थे जो गले, आज वीरानी हो गई।
समय का ये कसूर है या प्रेम में हल्कापन,
हर दिन की यादें बिखरी हैं, दिल में संजोकर रखता हूँ
खिड़की के किनारे बैठी, बचपन की हँसी याद आती है,
छत पर खेलते वो दिन, अब बस यादों में समाती है।
बरसात की बूंदों में भीगी वो शामें,
माँ की गोदी, पिता की हँसी, अब सुनाई नहीं देती
पुरानी किताबों में सहेजे पत्र, तस्वीरें याद दिलाते हैं,
हर मोड़ पर उनकी मुस्कान अब भी छुपकर मुस्कुराते हैं।
साथ खेलते साथी, हँसी के वो पल याद आते हैं,
आस-पास की दुनिया अब भी उन लम्हों में समाती है
घर खाली है, पर यादें यहाँ जीवित हैं,
सांझ और सुबह में भी उनकी छाया गूँजित हैं।
फूलों की तरह यादें खिलती हैं, मन को बहलाती हैं,
बीते पलों की खुशबू हर कोने में समाती हैं
जीवित रहते ही, रिश्तों की कहानी हो गई,
जीवित रहते ही, मिलते थे जो गले, आज वीरानी हो गई।