जनकपुर में आज सजा है, मंगल सुंदर धाम।
राम-सिया के दिव्य मिलन का, गूँजे जय श्रीराम॥
बोलो राम बोलो राम बोलो राम सियाराम..
मिथिला की धरती पर छाया, स्वर्ग-सा अनुपम वैभव
रंग-बिरंगे पुष्प बरसते, गंध भरी मधुर-सुगंध-रव,
हर गली में दीप जले थे, हर आँगन में थी मुस्कान
देख जनकपुरी बोल उठी बोलो जय जय श्री राम ।
राजा–महाराजा सब आए, ऋषि-मुनि देवों की धाम,
ब्रह्मा, रुद्र, नारद, गंधर्वसबने गाया शुभ-नाम।
इन्द्र सजे सहस्र-नयनों से, कार्तिकेय द्वादश लिए,
ब्रह्मा आठ, शंभु पंच दश नयनों से रामरूप रस पिए।
शंख-ध्वनि से भूमि गूँजी, वेद-मंत्र नभ में गाए,
मंडप चली जब जनकदुलारीनेत्र लोक के भर आए।
कुंतल बिखरे, मुख पर शोभा, चंदा-सा कोमल भान,
प्रभु चरणों पे नयन निखरतेदेव चढ़ाएँ फूल सुगंधित आन।।
मंडप में था प्रकाश अपारतेज पुंज दिव्य मिलन का,
मानो सूरज मिल चंद्र कली से उतर पड़ा धरती-आँगन का
राम–सिया ने हाथ जो पकड़ा, क्षण बना अनंत प्रकाश
धरती–अंबर, दिग्पालों ने पी ली भक्ति-रस की सुवास॥
हर्षित हुई जनकनंदिनी, नाच उठे सब नर-नारी,
ऋषि गण हाथ उठाकर बोले“धन्य-धन्य हो बलिहारी।”
कंठ थरथर, मन हरषितभजन-रसधारा बहती जाए,
राम–सिया विवाह-दर्शन का पुण्य लाभ जन पाए॥
आज दिशा-दिशा पावन हुई, प्रकृति खूब पुलकाई,
राम–सिया के मधुर मिलन से, सृष्टि भी हरषाई।
जो सुन ले यह पावन कथा, जो गा दे यह मंगल-गान
उस पर कृपा बरसाएँ सदासीतापति प्रभु राम॥