स्मृतियों के पुराने पन्नो
को आज हम थोड़ा पलटते हैं
अपने समय के शादी विवाह
के क़िस्सों की कुछ चर्चा हम करते हैं
देवोत्थानी के आते ही
देखुवा घर घर आ टपकते थे
गाँव गाँव में आठवी से बारहवीं में
पढ़ रहे बच्चों की टोह लगाते थे
घर में ज़मीन जायदाद,
बैलों की जोड़ी और
पक्का मकान से हैसियत
का पैमाना चुपके से करते थे
सरकारी नौकरी न ज्यादा होती थी
और न ही यह उत्तम दर्जे
का कर्म माना जाता था
देखुवा घर आने पर हम लोगों की
ख़ुशियाँ चरम सीमा पर रहती थी
बडो की बातें चुपके से हम सुनते थे
बड़े बड़े ख़्वाब पालते रहते थे
दोस्तों में चर्चा करते रहते थे ।
पुरानी यादें हैं यादों का क्या
विवाह की तैयारियाँ तो महीनों
पहले शुरू हो जाती थी
नाऊ काका रिश्तेदारों को
न्यौता घर घर जाकर पहुँचाते थे
अपना हक़ माँगते थे
मामा मामी, फूफा फूफी,
लगे लगाये सब सम्बंधी
अपने कुनबा सहित
महीनों पहले आ टपकते थे
समय का न कुछ बंधन था
रिश्तों का न कुछ अनबन था
जमकर जमावड़ा होता था
खूब धूम धड़ाका होता था
सामूहिक भोजन पकता था
घर में पूरा रौनक़ रहता था
बडा उत्सव जैसा लगता था
नये नये कपड़े सिलते थे
एक ही थान से सब कटते थे
भाई भाई, बहन बहनें
एक ही पोशाक पहनते थे
समता का यह द्योतक था
उसी में शान समझते थे
कम में काम चलाते थे
गिने चुने कपड़ों में ही हम
कई शादियाँ निपटाते थे
दरी-ग़लीचा, बर्तन-भांडा,
तख़्त- चारपाई और रज़ाई
सब कुछ माँगकर माँगकर लाते थे
शादी का खर्च बचाते थे
पूरी व्यवस्था में गाँव की
सामूहिक हिस्सेदारी होती थी
एक दूसरे का हाथ बाँटते थे
सहर्ष पूरा सहयोग सब करते थे
सब काम सरलता से निपटाते थे ।
पुरानी यादें हैं यादों का क्या
बाराती अपनी साइकिल
या बैलगाड़ी की सेवा करते थे
हाथी और घोड़े बारात की शान बढ़ाते थे
दुल्हा पीनस में चढ़कर जाता था
दुल्हन पालकी में पिया के घर आती थी
तीन दिनों की बारात का प्रचलन था
समय का न कुछ बंधन था
वरीक्षा से शादी पक्की मानी जाती थी
फिर वर्षों कार्यक्रम चलते रहते थे
लग्न, शादी-बारात, गौना- थौना सब होता था
शादी में कत्थक, शास्त्रार्थ, रंगारंग कार्यक्रम,
नृत्य - नौटंकी, आदि मनोरंजन का हिस्सा थे
कच्चा भोजन, पक्का भोजन,
लाई चबैना, ठंडे पेय पदार्थ आदि
शादी के स्वादिष्ट व्यंजन होते थे
वर वधु दोनों पक्षों के सम्मानित
विद्वानों का शिष्टाचार में
शास्त्रार्थ होता रहता था
सब अपनी विद्वता प्रदर्शित करते थे
जमकर एक दूसरे को टक्कर देते थे
बारातियों की जमकर सेवा होती थी
शान से बाराती तीन दिन मूँछ ऐंठते थे
लड़की वालो पर अपना रौब झाड़ते थे
पान की गिलोरी चबाया करते थे
शरीर पर इत्र छिड़कते रहते थे
मानो उनका पैदायशी नबावी रुतबा था
दक्षिणा मिलने तक बाराती नहीं हटते थे
दो चार रुपये में ही अपना गौरव पाते थे ।
पुरानी यादें हैं यादो का क्या
दूल्हे राजा की तो बात ही क्या कहने
दो दिनों का शहंशाह वह होता था
नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देता था
लोग आगे पीछे सेवा में चलते थे
अपने जूते भी स्वयम नहीं पहनता था
उसका ऐसा धाँसू रुतबा था
घड़ी, साइकिल, मरफ़ी बाजा
मुख्य रूप से यही दहेज का हिस्सा थे
तीनो जिसको शादी में मिल जाते थे
वह अपना परम सौभाग्य समझता था
जाति पाँति में पूरी समरसता थी
एक परिवार जैसे सब रहते थे
नाऊ काका, नाउन काकी, बढ़ई दादा,
भुजवा भैया, बरई, कुम्हार, माली भैया
सबके अपने अपने जलवे थे
सबके अपने अपने क़िस्से थे
शादी में सब बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे
और बारात की शान बढ़ाते थे ।
पुरानी यादें हैं यादों का क्या