पुरानी यादो की इस
पाँचवीं श्रृंखला में
चर्चा संयुक्त परिवारों पर
आज हम करते हैं
और पुरानी यादें ताज़ा करते हैं
बाबा जी और आजी जी,
दादा जी और दादी जी
छोटे पिताजी, बड़े पिताजी,
मंझले पिताजी,
बड़ी अम्मा जी, छोटी अम्मा जी,
मँझली अम्मा जी,
ढेरों काका जी और काकी जी,
भैया जी और भौजी जी,
जीजा जी और बहनें जी,
बुआ जी और फूफा जी,
सबके ढेरों बच्चे जी
पूरा एक कुनबा रहता था
एक लश्कर जैसा लगता था
साथ साथ सब रहते थे
साथ साथ सब सोते थे
मिल जुलकर सब रहते थे
साथ में भोजन पकता था
एक तरह का व्यंजन पकता था
अपनी पसंद नहीं चलती थी
लाइन लगाकर टाट पट्टी पर
पलथी मारकर हम सब बैठते थे
साथ में भोजन करते थे
भोजन करते वक़्त नहीं बोला जाता था
अपना परिवार इस हम कहते थे
वह भी एक ज़माना था ।
यादें हैं यादो का क्या
बाहरी कमाई सीमित होती थी
पर माँग भी असीमित नहीं रहती थी
घर का एक ही मुखिया होता था
हिटलर जैसा उसका अनुशासन चलता था
गृह प्रबंधन का वह मुखिया होता था
चूँ चूँ भी उसके समक्ष कोई नहीं कर सकता था
जो शहर में नौकरी करते थे
पैसे वे घर को भेजते रहते थे
कुछ सदस्य खेती पाती देखते थे
तो कुछ धंधा पानी करते थे
संयुक्त रूप से सब रहते थे
अपना पराया कुछ नहीं होता था
एक ही तराज़ू में सबको तौला जाता था
उदंडो को घर से निकाला जाता था
घरफोड़न उन्हें ठहराया जाता था
एक ही पहनावा सब पहनते थे
एक ही थान से कपड़ा कटता था
समानता का यह द्योतक था
महीनो तक गाँव का दर्ज़ी सिलता रहता था
उसे तक़ाज़ा करते रहते थे
पर वह किसी की नही सुनता था
अपनी मनमानी करता था
पुरुष बाहर का काम देखते थे
तो औरतें घर का प्रबंधन देखती थी
सबकी अपनी अपनी ज़िम्मेदारी थी
पर सामूहिक प्रबंधन ही चलता था
हिल मिल कर सब रहते थे
एक दूसरे का सुख दुख
साथ बाँटा करते थे
वह भी एक ज़माना था ।
यादें हैं यादो का क्या
संयुक्त परिवार बच्चों के
विकास के लिये अति उत्तम था
बुजुर्गों की छत्र छाया में सब
हम रहते थे और पलते थे
गोद गोद में घूमा करते थे
सबके कंधों की सेवा हम लेते थे
ख़ूब मज़े में हम करते थे
दलान में लालटेन जलती रहती थी
चारों ओर से घेर कर हम बैठे रहते थे
बड़ी दीदी, बड़े भैया हमें पढ़ाते थे
भोर में पाठ याद कराते थे
मिलकर सब हम रटते रहते थे
परीक्षा में अव्वल हम आते थे
ट्यूशन की तो बात दूर थी
घर में ही कइयों शिक्षक रहते थे
एकाकी पन ह्रास कभी नहीं होता था
अच्छा संस्कार हमें संयुक्त परिवार
में ही तो मिलता था,
अब तो सब कुछ टूट गये
संयुक्त परिवार सब बिखर गये
कुछ इधर गये, कुछ उधर गये
अपने बीबी बच्चों तक ही सीमित रहे,
लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष के दोषों ने
हमारी सोच को हवा दिया
अपनी पुरानी परम्परा
को हमने झट से तोड़ दिया
बीती बातें तो अब एक सपना है
नये युग में हमें रहना है
एकाकी पन का दंश झेलना है
केवल गुजरी बातें इस रचना
के माध्यम से याद करना है ।
स्वरचित रचना