यादें हैं यादों का क्या
जहन में मेरे बने रहती हैं.
अक्सर याद आता है मुझे
बचपन का वही पुराना घर
बड़ी बडी चौपाल घर की
कच्ची दीवालें और छप्पर
छत थी टपकती तो क्या हुआ
आत्मिक आनन्द उसमें मिला
आत्मीयता उसमें ही थी घुली
जान छिड़कता था परिवार पर
चौखट पर बैठी मेरी आजी
करती रहती देर तक इंतज़ार
स्कूल से जब वापस घर आते
पीठ पर थपकी दे करती दुलार ।
यादें हैं यादों का क्या
जहन में मेरे बने रहती हैं.
बाबा मुझको गोद में लेते
धूल में लिटाते जान बूझकर
कहते मज़बूत होती हैं हड्डियाँ
गाँव की माटी में ही लोटकर
बैठे रहते सगे सम्बन्धी
जलते अलाव के चहुँओर
कुशल क्षेम आपस में लेते
करते एक दूजे का सत्कार
शहर से जब घर मैं जाता
चक्कर पूरे गाँव का लगाता
हाल-चाल घर घर जाकर लेता
ख़ुश होते सब मुझको पाकर ।
यादें हैं यादों का क्या
जहन में मेरे बने रहती हैं.
दूध दही और मट्ठा लाते
चना चबैना साथ चबाते
लगती चारपाइयाँ द्वारे द्वारे
हँसी ठिठोली करते रात भर
लालटेन और ढिबरी जलती
पढ़ते भाई बहन हम साथ में
पिता जी का डर बना रहता
कुटाई हो जाती सवाल पर
ब्रह्म मुहूर्त में ही उठ जाते
रटते रहते अपना पाठ
याद आती लंबी छड़ी मुंशी जी की
कान मरोड़ते ऊपर से खींचकर ।
यादें हैं यादों का क्या
जहन में मेरे बने रहती हैं.
खेत खलिहान में हाथ बँटाते
सभी बड़ों का कहना मानते
शरारत भी खूब हम करते
सुदूर गाँवों तक नेवता जाते
ललक बनी रहती नेवते की
दौड़ पड़ते नाऊ काका के पुकार पर
नहीं रही अब वो पुरानी बातें
स्वप्न हुई अब पुरानी बातें
अपने तक ही अब सब सीमित हैं
किसी को नहीं मिलती फ़ुरसत है
सम्बन्ध हुये सब बेमानी हैं
कोई न सुनने वाला पुकार पर ।
यादें हैं यादों का क्या
जहन में मेरे बने रहती हैं.