कोहडा, तरोई, लौकी
टूटे फूटे छप्पर, मुँडेर, खपरैल
के छत की शान बढ़ाते थे
और बरसात के महीनों में
सब्ज़ियों का पूरा
जुगाड़ कर जाते थे ।
देशी टमाटर, आलू,
मूली, बैंगन, भिंडी आदि
जाड़े के मौसम में
लहसुन, मिर्ची और हरी धनिया
के साथ चटकारा लगाते थे ।
ये शुद्ध मौसमी सब्ज़ियाँ
सर्वसुलभ बहुतायत
घर घर रसोई का हिस्सा थीं
बाँट बाँट कर हम खाते थे
सबका काम चलाते थे
बाज़ार कभी न हम जाते थे
अपना खर्च बचाते थे ।
पुरानी यादें हैं यादो का क्या ...
दूध, दही, मक्खन और मट्ठा
का घर घर भरमार था
तो मटर,गन्ना,गुड़, घुइया
और शकरकंदी
सबके लिए इफरात था
लम्बी लौकी की तो बात
ही क्या कहने
इसका अपना रुतबा था
मेहमाननवाज़ी का
यह हिस्सा थी
रिश्तेदारों के साइकिलों में
शान से लटकाई जाती थी
सब्जी पर कुछ भी खर्च
नहीं करना पड़ता था
सामूहिक हिस्सेदारी से
सबका काम चलता रहता था
जिसके पास नहीं होता था
उसका भी हिस्सा रखा जाता था
साधन तो अति सीमित थे
पर सबका हृदय उदार था
आपसी मनमुटाव रहते हुए भी
रहता प्रेम अगाध था
खान पान और रहन सहन
की हर व्यवस्था में
सामूहिक हिस्सेदारी थी
एक दूसरे की सहायता करते थे
मिल जुलकर काम चलाते थे
आज की छुद्र मानसिकता
कहीं कहीं नहीं दिखती थी
हर आदमी एक दूसरे से
प्रेम से करता राम जुहार था !
पुरानी यादें हैं यादो का क्या ...