फूफा चरित्र

क्यों ग़ुस्सा करूँ बार बार

क्या मैं कोई फूफा हूँ

जो बात बात पर तुनक जाये

और कहे मैं अब चलता हूँ ।

हर बात अपनी मनवाये

अपने मन की वो करवाये

उनके मन की करो न बातें

छोड़ दूर बैठ वो जाये ।

सोचता रहता आयेगा कोई

कोई मना कर ले जायेगा

मान मनौव्वल का फूफा रोगी है

मान सम्मान पाते झुक वो जाये ।

फूफा का होता सम्मान का रिश्ता

सदियों से सम्मान उसने पाया है

उसी सनक में वो घूमता रहता

तुनुक मिज़ाजी का भूत छाया है ।

पर पहले वाली बात कहाँ

जब फूफा अकड़ कर चलते थे

शादी विवाह या मुंडन हो

नाक पर मक्खी नहीं बैठने देते थे ।

कौन पूंछता है आज फूफा को

कहीं किनारे बैठे रहते हैं

हाँ बुआ दौड़ती रहती इधर उधर

अपना उच्च स्थान सुरक्षित करती हैं ।

पहले जैसे न रिश्ते हैं

न अब पहले वाला सम्मान नही

समझदारी इसी में है फूफा जी

परिवर्तन को स्वीकार करो ।

मिल जुलकर बैठो साथ साथ

सबसे हंसी मजाक करो

परिवर्तन की इस धारा में

उल्टा न प्रवाह करो ।

नहीं तो अलग थलग पड़ जाओगे

माँ बाप भी किनारे बैठे रहते हैं

तुम तो केवल उनके दामाद ठहरे

अब पहले जैसे रिश्ते नहीं हैं गहरे ।

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