पटल-पटल घूमे कविवर, घर का भूला हाल ।
शब्दों में जीते सपनों का, खाली पड़ा थाल ॥
मोबाइल बजा, पत्नी ने कहा,छोड़ो अपना पटल ।
राशन नहीं है घर में, भूखे पेट बच्चे रहे मचल ॥
संगीत बजाओ, सुर उठाओ, व्यंग्य में डूबे जीवन ।
भूल जाओ घर द्वार अब कविता में ही तुम काटो जीवन ॥
सब्ज़ी का झोला ले गए, लाये हो भरकर अंग वस्त्र ।
इसी को खाओ, इसी को पहनो, कविवर मैं हो गयी तुमसे त्रस्त ॥
घूम रहे हो पटल-पटल, अपनी शान बघारते हो
घर में करते हो भजन, बाहर श्रृंगार गीत सुनाते हो ॥
वो शब्द कहाँ चले जाते हैं जब घर में पैर तुम रखते हो ।
यहां बन जाते मौनी बाबा, राग अलापना भूल जाते हो ॥
कथनी और करनी में अंतर उच्छृंखल जीवन है कवि का।
कोरी कल्पना में उड़ता रहता, पाँव नहीं धरती पे पड़ता ॥
जो लिखते हो, जरा सोचो, क्या अमल तुम उस पर करते ।
तुमसे तो वो अच्छे हैं, जो कहते हैं वही करते ॥
संगीत और व्यंग्य का संगम, यही घर का अद्भुत खेल ।
हँसी में घुला व्यंग्य, यही जीवन का सबसे बड़ा मेल ॥