यादों का कारवाँ
चलते चलते यूं ही कहां आ गए हमज़िन्दगी के ढलान पर खड़े हो गये हम,जीवन की आपाधापी में समय फिसल गया है कहाँ से चले और कहाँ आ गये हम । मृगतृष्णा के पीछे भागता ही रहा हूँ उलझता रहा सतत संघर्षों में जीवन,इच्छायें बहुत हैं पूर्ण कर पाया न कोई आत्मिक संतुष्टि कहां खो … Read more