दो अंजाने

दो अंजाने एक दिन मिलतेप्रणय सूत्र में बंधते हैं ,आपस में अजनबी हैं दोनों दाम्पत्य पथ पर चलते हैं ।एक राह के पथिक हैं दोनो साथ साथ वे चलते हैं, एक दूजे के मन की भाषा बिना कहे ही समझते हैं ।संग संग रहकर बातें करके राह सुखद हो जाती है, इक दूज के बिना … Read more

मां बाप का दर्द

इतना न इतराओ बच्चों ये माँ बाप तुम्हारी पूँजी हैं भीख नहीं ये मांग रहे प्यार में तुम्हारे झुकते हैं । तुम्हारी दया के पात्र नहीं साक्षात देव तुल्य हैं ये चाहे जितना दुत्कार मिलेआशीर्वाद हृदय से देते हैं ।हर चुनौतियों से लड़ते हुए तुमको पाला पोसा है सहारे की लाठी बन जाओ तुम्हारा सहारा … Read more

मिट्टी का घड़ा

मिट्टी का घड़ा ✍️किसी ने पूँछा घड़े से तुम इतना शीतल क्यों हो? घड़ा बोला -शीतलता मेरा गहना है कोमलता है मेरा स्वभाव विशुद्ध निर्मल मन है मेरा जीवन केवल परोपकार..पैदा हुआ मैं मिट्टी से अतीत है मेरा मिट्टी का किस बात का अहम् करूं जिस पर मैं इतराऊँ कृतघ्न नही कृतज्ञ हूँ मैं अपने … Read more

सुकून

दर दर भटकते फिर रहे सुकून की तलाश में,सुकून घर में ही बैठा मिला पर न दिखा वह निगाह में ।सुकून कोई वस्तु नही जिसे हम बाजार से ख़रीद लें, सुकून को यदि है ढूँढनाडूबकी लगाये गहरे ध्यान में ।मिल जाता है दो पल कासुकून बंद आँखों की बंदगी में,वरना थोड़ा थोड़ा परेशान तो हर … Read more

ऐ पथिक

तू तो केवल एक राही है चलना ही तेरी नियति है कर्म में ही है अधिकार तेरा ऐ पथिक तुझे चलना होगा । ठहराव नहीं अवसाद नहीं आशा में ही जीना होगा काँटों भरा पथ क्यों न हो इसे तुझे पार करना होगा । संघर्षों से जो घबड़ाते हैं वे तो कायर कहलाते हैंरंग मंच … Read more

कैसे कहूं मैं कवि हूँ

कैसे कहूँ मैं कवि हूँ पूरी वर्णमाला तक तो याद नहीं व्याकरण का पता नहीं अपना लिखा भी भूल जाता हूँ ठोक पीटकर जो गढ़ते हैंउनमें से मैं हूँ नहीं, कैसे कहूँ मैं कवि हूँ ।अन्तर्मन के मेरे शब्द मेरे बच्चों की तरह हैंजो समय पाकर बढ़ते रहते हैं नाराज़ होकर अपना अलग घर बना … Read more

एक कवि की वेदना

सोच रहा हूँ अगर गया तो क्या छोड़ूँगा अपने पीछे कुछ लिखी कवितायें जिसका कोई मोल न होगा इस तंग दिल दुनिया मेंदो एक दोस्त जिस परभरोसा है कुछ बना हुआवह भी कितना साथ निभायेंगे कुछ पता नहीं भागम भाग रहा जीवन हिसाब किताब की बही में ऐसा कुछ भी नहीं जो प्रिये तुम्हारी मुसीबतों … Read more

कान्हा मुक्तक

कान्हा कान्हा मन पुकारे, कान्हा में मन रमता हैकान्हा की मोहिनी सूरत पर, दिल मेरा जा टिकता है ठुमक ठुमक कर कान्हा भागे, माँ यशोदा पीछे धायेनंदबाबा टुकुर-टुकुर निहारे, ठुमकना अच्छा लगता है ।कान्हा की लीला है न्यारी, व्याकुल दौड़ती गोपियाँ सारीकान्हा मुरली की तान सुनावें,मंत्रमुग्ध हुई है प्रकृति सारी कान्हा वन में गाय चराते, … Read more

मैं अब बदलने लगा हूँ

दोस्तों !मैं अब स्वयं को बदलने लगा हूँ अपने में ही अब मैं जीने लगा हूँ नही पालता कोई टेंशन की बातेंअपने में ही मैं मुस्कुराने लगा हूँ ।लेखनी से भी दोस्ती करने लगा हूँमन में जो आये वो लिखने लगा हूँ नही पड़ता बेमतलब के पचड़ों में सेवानिवृत्ति का लुत्फ़ लेने लगा हूँ ।बेबसी … Read more

राधे कृष्ण भजन

आओ श्याम न करो देर श्री राधे बाट निहार रही,महा रास की बेला आ पहुँची सखियों संग बाट निहार रही ।चंदा सी शीतल चाँदनी में सखियों संग राधे विराज रही,फूलों से बगिया महक रही यमुना भी लहरें मार रही । कोई कुंज निकुंज संवार रही कोई राधा जी को निहार रही, कोई हाथ में मेंहदी … Read more