हरी हरी घासों पर
सुबह फैली ओस की बूँदे,
क्षण भर के लिये ही सही
नैसर्गिक सौंदर्य बिखेर रही।
बिखरी मोती के दाने जैसे
ओस की बूँदे लुभा रही,
कर रही शांति प्रदान
मन को प्रफुल्लित कर रही ।
जीवन अस्तित्व क्षण भर का
सूर्य की ताप रश्मियों तक,
विलुप्त हो जायेगी वे
पर परवाह न कर रही ।
सूर्य एक सत्य है
ओस भी तो एक सत्य है,
जीवन क्षणिक है तो क्या हुआ
ख़ुशियों में जीवन जी रही ।
जिये जीवन ख़ुशियों में
अल्प काल के लिये ही सही,
दूब पर फैली ओस की मानिंद
विलुप्त होने से न डर रही ।