पीछे मुड़कर देखूँ तो प्रभु,
तू ही दिखे हर मोड़
सुख-दुःख दोनों तेरे ही रंग,
जीवन तेरी डोर
बचपन बीता खेल-खेल में,
नाम तेरा अनजान,
मिट्टी में जो हँसी बिखेरी,
वही बनी पहचान।
आज समझ आया जीवन क्या,
कल था जो कुछ और
पीछे मुड़कर देखूँ तो प्रभु,
तू ही दिखे हर मोड़
यौवन आया, मन भरमाया,
माया का संसार,
सपनों की पतंग उड़ी ऊँची,
टूटी बारंबार।
ठोकर देकर तूने ही फिर,
दिखलाई निज ठौर
पीछे मुड़कर देखूँ तो प्रभु,
तू ही दिखे हर मोड़
संग मिला, संबंध मिले,
हँसी गूँजी घर-द्वार,
पर हर अपने में छिपा हुआ,
बिछुड़न का उपहार।
जो गया वह तेरा था प्रभु,
जो है वह भी तोर
पीछे मुड़कर देखूँ तो प्रभु,
तू ही दिखे हर मोड़
सुख तो क्षण का मेहमान है,
दुःख गुरु समान,
जल-जल कर ही मन के भीतर,
जगता है भगवान।
अब न चाहूँ कुछ भी प्रभु,
छूटे यह अहं-डोर
पीछे मुड़कर देखूँ तो प्रभु,
तू ही दिखे हर मोड़
मैं न रहा, तू ही शेष है,
बाकी सब अवरोध