नैनों की भाषा कह न सके कोई,
मन की गहराई माप न सके कोई
नयनों से नयन जब मिल जाते हैं
बिना कहे सब कुछ कह जाते हैं ।
मौन अधर पर शब्द न आते,
फिर भी भाव बहा जाते हैं
नयन मिले तो जग थम जाए,
सब बंधन ढहा जाते हैं
प्रीत जहाँ सच्ची हो जाए,
वहाँ प्रभु स्वयं आते हैं
नैनों की भाषा कह न सके कोई॥
भक्त हृदय में दीप जले जब,
हरि नाम सुधा बरसाते हैं
मिट जाए अहं का अंधियारा,
मन मंदिर मुस्काते हैं
जहाँ भक्ति प्रेम बन जाये
वहाँ प्रभु दौड़े आते हैं
नैनों की भाषा कह न सके कोई॥
ना माला, ना दीप, धूप
बस सच्चे भाव प्रभु को भाते है
जहाँ मौन ही जप बन जाये
श्वास श्वास हरि गाते है
हरि लीला देख देख कर
देव गण भी हर्षाते है
नैनों की भाषा कह न सके कोई॥