मित्र और माँ

एक मित्र ने दूसरे से कहा –

“हेलो दोस्त! क्या हाल चाल है?

बहुत दिनों बाद मिले यार

आओ बैठ कर कुछ गपशप करें,

कुछ पुरानी बातें याद करें।”

घर में मन कहाँ लगता,

दिन भर चिक-चिक में ही दिन बीतता।

दोनों बैठ गए पास के पार्क में,

एक बेंच पर, पुराने दोस्त।

बहुत छनती है जब मिल बैठते हैं,

पुरानी गपशप, पुरानी यादें।

अचानक एक मित्र बोला –

“यार, आंटी कैसी हैं?

उन्हें मेरा प्रणाम कहना।”

दूसरे मित्र ने मुस्कुराते हुए कहा –

“क्या बताऊँ!

मैं इतना धनी नहीं कि अपनी बूढ़ी माँ साथ रख सकूँ।

वो भी पत्नी से रोज-रोज की चिक-चिक

कौन सुने?

फ़िलहाल, पास के अनाथालय में रह रही हैं,

वहाँ वे खुश हैं, उन्हें कोई शिकायत नहीं।”

पहला मित्र – “अच्छा, तुम बताओ

अपनी हाल चाल, आंटी साथ में तो रहती हैं न?”

दूसरा मित्र – “क्या बताऊँ

मेरी क्या औक़ात कि उन्हें साथ रखूँ?

उन्होंने मुझे अपने श्री चरणों में स्थान दे रखा है,

यही क्या कम है!

मैं बहुत ही सौभाग्यशाली हूँ।

नहीं तो मैं कहाँ जाता?

माँ का प्यार और दुलार कहाँ पाता?

ईश्वर से यही प्रार्थना है –

माँ का आशीर्वाद मुझे हमेशा मिलता रहे।”

पहला मित्र मन ही मन बुदबुदाया,

कुछ अनमना सा दिखा

“क्या बोलूँ मित्र!

चलो अब चलते हैं,

मेरे पास कोई शब्द नहीं

तुम भाग्यशाली हो!”

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