कभी-कभी पीछे मुड़कर देखता हूँ,
तो लगता हैमेरे जीवन की पगडंडी पर
कितनी धूप बिखरी, कितनी परछाइयाँ चलीं,
कितनी हँसियाँ खिलीं और कितने आँसू
चुपचाप मेरी पलकों पर मोती बनकर सूख गए।
बचपन
वह जैसे हवा का एक झोंका था
छूकर भी न पकड़ में आता।
मिट्टी में खेलते हुए जो हँसी गिरे थे,
वे आज भी दिल के किसी कोने में
धड़धड़ाते दिल की तरह धड़कते हैं।
स्कूल के दिन
शरारतें, डाँट, मास्टर की आवाज़ें,
और उन सबके बीच कहीं छिपी मेरी छोटी-सी मुस्कान
सब जैसे किसी पुराने गीत की धुन बनकर
कभी-कभी रातों में लौट आती है।
युवावस्था ने कदम बढ़ाए तो जीवन दौड़ने लगा।
नौकरी की राहें, ज़िम्मेदारियों के बोझ,
और सपनों की पतंग जो कभी उड़ती, कभी टूटती
सबने मुझे थोड़ा-थोड़ा करके परिपक्व बनाया।
फिर विवाह
जैसे किसी अकेले दिल को उसका साथी मिल गया हो।
एक हाथ जो मेरे हाथ में आया,
तो लगाअब यह यात्रा अकेली नहीं।
बच्चों की किलकारियों ने
जीवन के सूने कमरों में
नयी धड़कनों, नयी रोशनियों को जन्म दिया।
पर समय
समय बड़ा अजीब है।
सुख के पल आते हैं तो
उँगलियों के बीच से रेत की तरह फिसल जाते हैं
मुस्कराने का मौका मिलता है,
और वह पल उड़ भी जाता है।
दुःख की घड़ियाँ?
वे जैसे टिक-टिक करती घड़ी की आवाज़ हैं
धीमी, भारी, रुक-रुककर चलने वाली।
वे रातें जिन्हें काटना मुश्किल था,
आज याद आती हैं तो लगता है
कि उन रातों ने ही मुझे मजबूत बनाया।
कभी मन पूछता है
उम्र बढ़ रही है या मैं बस धीरे-धीरे
अपने ही कुछ हिस्सों से विदा ले रहा हूँ?
जो साथी बिछड़ गए,
वे जैसे मेरे जीवन की किताब के
अधूरे पन्ने हैं;
जिन्हें पलटते ही दिल अचानक भारी हो जाता है।
काश, वे कुछ और देर साथ रहते
काश, कुछ पल और मिल जाते
अब तो इतना ही चाहता हूँ
कि कोई क्षण मेरे हाथ से व्यर्थ न झरे।
समय अपनी राह पर दौड़ रहा है
मैं उसे रोक नहीं सकता।
पर उसके भीतर
मैं अपने लिए छोटे-छोटे सुख,
छोटे-छोटे पल,
छोटे-छोटे आश्रय
ज़रूर बना सकता हूँ।
अब समझ में आता है
जीवन कहानी नहीं,
मन की धड़कनें हैं।
हर धड़कन एक स्मृति है,
हर स्मृति एक साँस
जो बीतकर भी रह जाती है।
और अंत में
जीवन वही है जिसे हमने महसूस किया
वह स्पर्श, वह हँसी, वह पीड़ा,
वह साथ, वह विरह, वह सबकुछ
जो हमें आज का “हम” बना गया।
बाकी सब तो समय की उड़ती परछाइयाँ हैं
देखते-देखते गुज़र जाती हैं,
पर दिल पर अपना निशान छोड़ ही जाती हैं।