श्रीकृष्ण वाणी मौन भी अधर्म का साथ है
मौन भी अधर्म है यदि आप मौन हैं!
हे अग्रज भ्राता बलराम!
आज आप अपने प्रिय शिष्य दुर्योधन के
जाँघ पर वार करने पर प्रश्न उठा रहे हैं
किस नीति की बात कर रहे आप?
कहाँ थे आप उस समय
जब भीम को विष दिया गया था?
तब आप मौन रहे।
जब लाक्षागृह में पांडवों को जलाने की योजना बनी,
तब भी आप मौन रहे।
द्रौपदी की लाज सभा में लुट रही थी,
तब भी आपकी गदा मौन रही।
अभिमन्यु,
जब धर्म के सारे नियम तोड़कर मारा गया
तब भी आपकी आत्मा मौन रही
मौन ही तो रहे हैं आप !
और आज जब भीम ने दुर्योधन को मारा,
आप नियमों की बात करते हैं?
हे भ्राता! जो धर्म के समय मौन रहा
उसे कहने का कोई अधिकार नहीं!
धर्म तटस्थता नहीं माँगता,
धर्म कर्म माँगता है!
मौन रहना निष्पक्षता नहीं,
भय का रूप है पलायन का स्वरूप है!
जो अन्याय देखकर चुप रहता है,
वह अन्याय का भागी होता है।
धर्म वह है जो सत्य के साथ खड़ा रहे,
चाहे समस्त जग विरोध में क्यों न हो!
धर्म का अर्थ दल नहीं,
धर्म का अर्थ कर्म है।
जो सत्य बोले, जो न्याय करे,
जो दूसरों के दुःख में खड़ा हो वही धर्म है!
वही मेरा भक्त है।
मैं वहाँ नहीं जहाँ भीड़ है,
मैं वहाँ हूँ जहाँ सत्य है।
मौन भी अधर्म है यदि आप मौन हैं!