मनसा आरती भजन

रे मन ! क्यूँ न कर तू मनसा आरती

भाग रहा है इधर उधर ।

जड़ चेतन सब हरि रूप हैं

सर्व व्यापी अरु नित्य स्वरूप,

राग द्वेष हैं दुख के कारक

रे मन ! इनको वश में तू कर,

कर ईश से मनसा प्रार्थना

मन की श्रद्धा से तू धूप*कर ।

धूप के बाद, दीप* दिखा दे,

आत्म ज्ञान का भीतर प्रकाश कर,

क्रोध, मोह, मद से दूर हो

ज्ञान प्रकाश से दीप जला दे,

रे मन ! कर आरती, माँग वर प्रभु से,

चित्त वृत्तियों को क्षीण कर ।

निर्मल श्रेष्ठ भाव रख मन में

विशुद्ध भाव का सुन्दर *नैवेद्य कर,

दूर करें जो मन की वासना

प्रेम रूपी ताम्बूल* निवेदन कर,

रे मन ! कर आरती, माँग वर प्रभु से

कलुषित मन को निर्मल कर ।

कर्म रूपी घृत की बाती* जला

इन्द्रिय रूपी वृत्तियों को

त्याग अग्नि से तू दग्ध कर,

त्याग तमोगुण के विकार

सत्वरूपी गुण का प्रकाश कर

रे मन ! तू मनसा आरती कर ।

बिछा दे इक सुन्दर पलंग

अपने महाराज को उस पर बिठा,

रे मन ! कर प्रभु की खूब सेवा

क्षमा, करुणा, दासियों को नियुक्त कर,

माँग ले प्रभु से अनन्य भक्ति

भेद रूपी माया को दूर कर ।

जपते हैं नित ध्यान प्रभु का

सनकादिक, वेद, शुक देव आदि,

शेष, शिव और नारद मुनि

करते रहते हैं गुणगान,

रे मन ! कर ले मनसा आरती

कुछ पल हरि का ध्यान कर ।

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